Wednesday, 29 August 2012

मुजफ्फरपुर का सांस्कृतिक इतिहास


                               मुजफ्फरपुर का सांस्कृतिक इतिहास

प्राचीन लिच्छवी राजाओं की राजधानी वैशाली का निकटवर्ती मुजफ्फरपुर अघोषित रूप से बिहार की सांस्कृतिक राजधानी है | इस जिले की अपनी एक विशिष्ट संस्कृति है, समृद्ध इतिहास है, जिसके विभिन्न पक्ष और आयाम स्वतंत्र रूप से शोध की अपेक्षा रखते हैं |
                            प्राचीन संस्कृति और इतिहास के प्रस्तरों में दबा हुआ वैशाली गणराज्य तीर्थंकर महावीर के जन्म और भगवान् बुद्ध के परिनिर्वाण पर्यंत कई महत्वपूर्ण वर्षावासों का साक्षी है | कभी लिच्छवियों की सम्पूर्ण सांस्कृतिक इयत्ता के साथ वहाँ की राजनीति के केंद्र में खड़ी राजनर्तकी अम्बपाली ने अपनी सौन्दर्य चेतना से अपने समय के संगीत-नृत्य और काव्य को समृद्ध किया था | साथ ही भोग और ऐश्वर्य के बीच वैराग्य और निष्कामता का सन्देश भी दिया था | मुजफ्फरपुर जिले के मनोगठन में गणतंत्र की इस प्रयोग भूमि की वैचारिक चेतना का सर्वाधिक प्रभाव दृष्टिगत होता है |
              संस्कृति एक व्यवस्था है, जिसमें हम जीवन के प्रतिमानों, व्यवहार के तरीकों,बहुत से भौतिक-अभौतिक प्रतीकों,परम्पराओं,विचारों,सामाजिक मूल्यों,मानवीय क्रियाओं और आविष्कारों को सम्मिलित करते हैं | इतिहासज्ञों के अनुसार संस्कृति का सम्बन्ध किसी भी क्षेत्र के जीवन की उन्नत उपलब्धियों से है | इसी कारण दर्शन,धर्म,विज्ञान,कला,साहित्य और संगीत की उपलब्धयों के इतिहास को ही हम संस्कृति का इतिहास कहते हैं |
                         मुजफ्फरपुर में सन 1908 ई० में महान क्रांतिकारी अमर शहीद खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी द्वारा घटित बमकांड ने जिस प्रकार अंग्रेजी सत्ता की नींव हिलाकर चुनौती दी थी |  उस  घटना से पूरे विश्व में मुजफ्फरपुर जिले का नाम चर्चा में आया | शहीद जुब्बा सहनी, वैकुण्ठ शुक्ल और भगवान् लाल के नाम बिहार की शहादत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज हैं | मगर मुजफ्फरपुर के युवाओं की राजनीतिक-वैचारिक चेतना की प्रखर पहचान 1917 में राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी की चंपारण यात्रा के क्रम में  मुजफ्फरपुर आगमन से हुई | क्योंकि उसी समय यहाँ के तत्कालीन युवाओं को अपनी राजनीतिक दिशा तय करने का अवसर प्राप्त हुआ | चंपारण में नील की खेती करने वाले किसानों पर  
 नीलहे अंग्रेज अफसरों के दमन के विरुद्ध महात्मा गाँधी के आन्दोलन में संगठित किसानों के नेता पं० राजकुमार शुक्ल के साथ यहाँ के कुछ समर्पित सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चंपारण में अथक संघर्ष किया | इसके बाद महात्मा गाँधी,डॉ.राजेन्द्रप्रसाद एवं जे.बी.कृपलानी के नेतृत्व में गाँधी के समर्पित अनुयायी ध्वजा प्रसाद साहू और बाबू लक्ष्मी नारायण ने बिहार खादी आन्दोलन की ज़मीन तैयार की | स्वतंत्रता संग्राम में यहाँ के सेनानियों की भूमिका अलग से रेखांकित करने योग्य है |
                         धार्मिक क्षेत्र में,बाबा गरीबनाथ मात्र इस जिले के ही नहीं सम्पूर्ण बिहार के शिवभक्तों की अखंड आस्था के प्रतीक हैं | श्रावण मास में गरीबनाथ धाम में हरवर्ष लगातार बढती भीड़ देखकर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान बिहार का यह शिवधाम आज अपनी महिमा में देश के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित ज्योतिर्लिंगों से कहीं कम  नहीं | नगर के मध्य रमना में स्थित बाबू उमाशंकर प्रसाद द्वारा स्थापित वरदायिनी भगवती त्रिपुरसुन्दरी के अष्टधातु निर्मित सौम्य विग्रह की महिमा की भी अनेक कथाएँ यहाँ कही-सुनी जाती हैं | कच्ची सराय रोड स्थित माता बगलामुखी मंदिर कामरूप कामाख्या के बाद तंत्र साधना का दूसरा सिद्ध पीठ है | वैष्णव आस्था का प्रतीक चतुर्भुज स्थान मंदिर लगभग सात सौ वर्ष पुराना है |
                                                        इस शहर के सांप्रदायिक सदभाव का प्रतीक है –   दाता  कम्बल शाह का मजार | दाता के चमत्कारों की किम्वदंतियां दूर दराज़ के क्षेत्रों तक फैलीं हैं | काव्य भाषा के रूप में खड़ीबोली की स्वीकृति का उद्घोष सर्वप्रथम मुजफ्फरपुर से बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री ने 1887 ई० में किया था | प्रसिद्ध  उपन्यासकार देवकीनंदन खत्री की “ चंद्रकांता “ और  “चंद्रकांता संतति” की रचना भूमि मुजफ्फरपुर ही है | भारतीय कथाजगत के शलाकापुरुष शरतचंद्र ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास “श्रीकांत “ के महत्वपूर्ण अंश इसी शहर में लिखे | कवीन्द्र रवींद्र नाथ टैगोर का तो इस शहर से पारिवारिक सम्बन्ध रहा है |उनकी बड़ी पुत्री माधवीलता इसी शहर के एक प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में ब्याही थीं | 1913 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त होने के बाद गुरुदेव का पहला नागरिक अभिनन्दन इसी शहर में हुआ था | ललित कुमार सिंह “नटवर” जैसे बहुविध साहित्यकार एवं अभिनेता इसी शहर की देन हैं | रामवृक्ष बेनीपुरी, रामजीवन शर्मा जीवन और मदन वात्स्यायन की रचनात्मक प्रतिभा यहीं  से सम्पूर्ण साहित्य जगत में प्रसरित हुई | उत्तर छायावाद के शिखर पुरुष महाकवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री का सम्पूर्ण जीवन यहीं बीता | उनका निवास “निराला निकेतन “  हमेशा  उनकी स्मृतियों की धरोहर के रूप में जाना जायेगा | आज भी कवि - साहित्यकारों की एक साथ चार पीढियां यहाँ    विभिन्न विधाओं में एक साथ सक्रिय हैं |
                        यहाँ की जनभाषा बज्जिका है, जिसमें लोकजीवन और लोकसाहित्य की विशाल सम्पदा है | साहित्यकर्म में भी अब यह भाषा काफी लोकप्रिय है | मगनीराम, हलधर दास, बुनियाद दास की  प्राचीन परंपरा से युक्त इसका साहित्य आज निरंतर विभिन्न विधाओं में उन्नति की ओर अग्रसर है | डॉ. अवधेश्वर अरुण रचित “बज्जिका रामाएन” के रूप में इसकी काव्य चेतना शिखर पर पहुँच चुकी है |
                        यहाँ की संगीत परंपरा 18 वीं सदी में पं. विष्णुपद मिश्र की हवेली संगीत गायकी से शुरू होती है | वे नगर के एक प्राचीन मंदिर में ध्रुपद शैली में भजन गाया  करते थे | उसके बाद 19 वीं सदी में अब्दुल गनी खां खयाल गायक का नाम लिया जाता है | पं. सीताराम हरि दांडेकर राष्ट्रीय स्तर के संगीतज्ञ थे, जिनकी शिष्य परंपरा अब कई शाखाओं में देश के विभिन्न क्षेत्रों में फैली है |
                        चित्रकला के क्षेत्र भी मुज़फ्फरपुर की ख्याति राष्ट्रीय स्तर पर रही है | महादेव बाबू,सरोजिनी वाजपेयी, तपेश्वर विजेता और लक्ष्मण भारती ने अपने कलात्मक चित्रों और पेंटिग्स से प्रान्त के बाहर भी प्रसिद्धि प्राप्त की है | विज्ञान के क्षेत्र में भी मुजफ्फरपुर के अतीत की उपलब्धि चर्चा में रही है | यहाँ के वैज्ञानिक दुर्गाप्रसाद चौधरी की वैज्ञानिक खोज को देश स्तर पर प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है |
             कुल मिलाकर मुजफ्फरपुर जिले का सांस्कृतिक –ऐतिहासिक वैविध्य गहन शोध और विस्तृत विवेचन की अपेक्षा रखता है | इसे अगर बिहार की सांकृतिक राजधानी कहा जाता है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति  नहीं है |