Friday, 12 July 2013

“साथ मेरे चल रही है इत्र में डूबी हवा........”

कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह की जन्मतिथि 12 जुलाई पर विशेष


साहित्य को अपना सम्पूर्ण जीवन देने वाले, एक सम्पूर्ण गीतिमय व्यक्तित्व कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह का स्मरण आते ही यहाँ की फिजाओं में तैरते उनके उनके गीत की अनुगूंज भी साफ़ सुनाई देती है – “साथ मेरे चल रही है, इत्र में डूबी हवा / तो अकेला मैं नहीं हूँ, मैं नहीं हूँ, मैं नहीं हूँ |” हिंदी गीत के बदलते स्वरूप और उसकी संरचना में गीत का एक नया विकास देखते हुए कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने उसका नामकरण ‘नवगीत’किया | उनके द्वारा निर्दिष्ट ‘नवगीत’ का मूल स्वभाव ‘मनोलय’ आज उन्हीं के गीत की लगातार कायम अनुगूंज के साथ सिद्ध हो रहा है | कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह के रचना कर्म का अधिकांश गीत रचना और गीत विधा के नव्यतर विकास तथा उसके प्रभाव विश्लेषण में व्यतीत हुआ है | नवगीत का स्वीकृति-संघर्ष हो या जन सांस्कृतिक मानवीय संस्कार और संघर्ष-शक्ति से अनुप्राणित जनबोधी गीत तक की उनकी रचना यात्रा में हमेशा ही बदलते शिल्प और विचार –दर्शन का आह्वान ही दिखाई पड़ता रहा |
कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने 1958 में नवगीत के प्रथम संकलन ‘गीतांगिनी’ का सम्पादन किया और परम्परित गीत रचना से भिन्न आधुनिक भावबोध और शिल्प बोध से संपन्न नए गीतों को ‘नवगीत’ के रूप में हिन्दी साहित्य में स्वीकृति दिलायी | उन्होंने स्वयं द्वारा संपादित नवगीत के प्रथम संकलन ‘गीतांगिनी’के सम्पादकीय के रूप में नवगीत का घोषणा-पत्र प्रस्तुत करते हुए उसके पांच विकासशील तत्वों को निरूपित किया | वे हैं- जीवन दर्शन,आत्म निष्ठा, व्यक्तित्व बोध,प्रीति तत्व और परिसंचय | कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने नवगीत विश्लेषण के क्रम में ‘शब्द की लय’ की अपेक्षा ‘अर्थ लय’और उससे कहीं अधिक ‘मनोलय’ को महत्वपूर्ण माना है |
कवि की प्रथम नवगीत कृति ‘आओ खुली बयार’ 1962 में प्रकाशित हुई,जिसमें कवि के आधुनिकता बोध की संवेदनापूर्ण अभिव्यक्ति हुई है | इस संग्रह में संकलित ‘आरोही का गीत’ की कुछ पंक्तियाँ-लालसा पहाड़ की फसल /ढाल-ढाल झूमती हुई / बाढ़ से बची रहे मगर / मेघों को चूमती हुई / ज़िन्दगी खुदी नहीं / रेत की नदी नहीं /प्यार धार बाँध का झरे / तुम भरी-भरी लगीं मुझे /धुंध से जभी निकल पड़ीं | 1980 में उनकी दूसरी नवगीत कृति ‘भरी सड़क पर’ प्रकाशित हुई,जिसमें कवि के शब्दों में मध्यम वर्गीय जीवनानुभव और जिजीविषा की अभिव्यंजना करने वाले गीत हैं तथा मानवीयता की सहसंघर्षी अनुभव-दृष्टि भी है | 1981 में ‘रात आंख मूंदकर जगी’ का प्रकाशन हुआ, जिसकी रचनाएं प्रायः तीन दशकों में बदलती वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक और रचनात्मक मूल्य बोधों के तापमान में ढली हैं | इसमें प्रेमपरक नवगीत भी संकलित हैं, जो आस्वाद के धरातल पर पिछले नवगीतों से पर्याप्त भिन्न हैं | 1982 में इस जनपक्षधर कवि के जनबोधी गीतों का संग्रह ‘गजर आधी रात का’ प्रकाशित हुआ | इस संग्रह के जन संस्कार गीत शिल्प- सौन्दर्य की दृष्टि से अनुपम हैं | सोहर, मुंडन गीत,परिछन, बँटगवनी ही नहीं इसमें सामूहिक श्रम गान भी संकलित हैं |
राजेन्द्र प्रसाद सिंह की गीत रचनाओं का ठोस वैचारिक आधार है | कारण है मात्र भारतीय संस्कृति और साहित्य ही नहीं विश्व स्तर पर विकसित तमाम प्राचीन-अर्वाचीन साहित्य और ज्ञान धाराओं के वे गहरे अध्येता रहे | उन्होंने साहित्य में यथास्थितिवादियों, उपभोक्ता संस्कृति के परिचारकों और उनकी रचनाशीलता का हमेशा विरोध किया | वे नवगीत और आधुनिक कविता में जनपक्षधर रचनाशीलता के संवाहकों में अगली पंक्ति के रचनाकारों में से थे | उनकी अंतिम नवगीत कृति ‘लाल नील धारा’ में वैचारिक और कलागत उत्कर्ष गीत की सतत् पुनर्नवता को सिद्ध करता है –बालू के द्वीप श्रृंखला हैं / अब अभाव में घुटी नदी /गिद्धों को नाव सौंप दूं, या/ कच्छप बन सहूँ त्रासदी ?
आज कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह नहीं हैं मगर अपनी सतत् पुनर्नवता को बराबर सिद्ध करते उनके नवगीत नयी रचनाशीलता को हमेशा दिशा देते रहेंगे और जीवन की अंतिम सांस तक सक्रिय एक रचनाकार को हमारी स्मृति और चर्चा से कभी ओझल नहीं होने देंगे |