Saturday, 15 March 2014

रंग-बिरंगे गुलाल से पटी एक सड़क




रंग-बिरंगे गुलाल से पटी एक सड़क

उत्तर बिहार में मुजफ्फरपुर शहर की होली अपने प्रगाढ़ साम्प्रदायिक सद्भाव के गहरे और अमिट रंग के कारण प्रसिद्ध है | यहाँ की होली की कुछ ख़ास विशेषताएँ हैं, जो इसे अन्य शहरों में भी चर्चा का विषय बनाए रखती हैं | यहाँ होली के महीने दिन पूर्व से ही विभिन्न सामाजिक सांस्कृतिक संगठनों द्वारा आयोजित ‘होली मिलन समारोह’ में सभी सम्प्रदायों और तबकों की जुटने वाली भीड़ को औपचारिकता का जामा देकर यदि छोड़ भी दें तो होली के ऐन दिन गोधूलि वेला से रात उतरने के पहले सरैयागंज टावर से चतुर्भुज स्थान मंदिर तक जानेवाली सड़क का रंग-बिरंगे गुलाल से पट जाना बरबस ही लोगों को उन पुराने दिनों की याद ताज़ा करा देता है, जब मुजफ्फरपुर के सुप्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी, नाटककार और अभिनेता स्व.ललित कुमार सिंह ‘नटवर’ ने गंगा-जमुनी तहजीब वाले इस शहर को सद्भाव का यह अनोखा रंग दिया होगा |
                                           कभी मैंने मुजफ्फरपुर शहर पर केन्द्रित अपनी कविता में लिखा था –“कुछ है, जो बाहर से ही दीख जाता है / इस शहर में / शाम होते ही नृत्य-गीत से गुलज़ार एक सड़क / मजार से शुरू होकर मंदिर तक जाती है / और रात गये कई छोटी-छोटी गलियों में खो जाती है, जिसे हर सुबह ढूंढ कर निकाल लाते हैं / पुलिस और पत्रकार |” बिहार के विख्यात फकीर दाता कम्बल शाह का  मज़ार और दो सौ साल से भी अधिक पुराना चतुर्भुज स्थान मंदिर इसी सड़क के हिस्से हैं और उन दोनों के बीच वर्षों से गुलज़ार हैं यहाँ तवायफों का एक पूरा मोहल्ला |  शहर के इस हिस्से की जुबान बनारसी है और अंदाज़ लखनवी | यहाँ ईद भी होती है और छठ के अवसर पर पूरे व्रत-उपवास के साथ भगवान आदित्य की आराधना का अनुष्ठान भी | होली अन्य शहरों में भी होती है | मगर रंग-गुलाल से पटी सड़कें केवल यहीं देखने को मिलती हैं | कभी नवयुवक समिति के संस्थापक ललित कुमार सिंह ‘नटवर’ ने इस परंपरा का सूत्रपात किया था | तब नगर के गणमान्य बुद्धिजीवी साहित्यकार, पत्रकार और व्यवसायियों के साथ शहर के हरेक वर्ग और सम्प्रदाय के लोग इसमें शामिल होते थे | इसी सड़क से उनकी टोली एक दूसरे को गुलाल लगाती गुजरती थी | इस सड़क से मिलने वाली हरेक गली के मुहाने पर जिले के दूर दराज क्षेत्रों के लोग खड़े मिलते, एक दूसरे को गुलाल लगाते, गले मिलते और फिर उस टोली का हिस्सा बन जाते | होली में हरेक परिचित के यहाँ जाना संभव नहीं था इसलिए सबसे मिलने का इससे बेहतर स्थान दूसरा नहीं था | पहले सरैयागंज टावर से चलकर गरीबनाथ धाम में शिवलिंग का गुलाल से अभिषेक,  सोनारपट्टी में ठंढई का दौर  फिर कम्बल शाह मजार पर इबादत और तब चतुर्भुज स्थान मंदिर में स्थापित चतुर्भुज विष्णु को अबीर-अर्पण | सबके चेहरे पर होली का उल्लास और मस्ती, विभिन्न रंगों के अबीर से मिलकर बना एक नया मटमैला रंग, यही है अपनी मिट्टी से उपजा सद्भाव का सोंधा रंग “विविध रंग मिलि एक बरन भये” |
                                                  इस नगर की संरचना में विभिन्न सम्प्रदायों के परस्पर सद्भाव की एक अप्रत्यक्ष बुनावट है, जिसके धागे भले ही रेशमी हों मगर पारस्परिक कसाव ऐसा है कि राज्य और देश के अन्य क्षेत्रों की किसी  भी उन्मादी लहर का कोई असर यहाँ नहीं होता | यहाँ दुःख और गम, आनंद और उल्लास का बस एक ही मजहब है- इंसानियत - “मंदिर की घंटियों में जब घुलती है / मस्जिद की अजान / गिरजा की प्रार्थना में, गुरद्वारे के सबद / इसी समवेत से सुबह-सुबह जगता है यह उनींदा शहर | इस शहर में चिड़ियों को मालूम नहीं है गुम्बदों का फर्क / यहाँ दुःख और गम, आनंद और उल्लास का कोई मज़हब नहीं है |”
                                                  ईश्वर गंगा-जमुनी तहजीब के इस शहर को बुरी नज़र से बचाये | इसके सद्भाव का रंग हमेशा चटक बना रहे | अपने सभी मित्रों को रंग और उल्लास के पर्व होली की हार्दिक शुभकामनाएँ |
   
   

Thursday, 13 March 2014

समरसता और सद्भाव का लोकपर्व होली



समरसता और सद्भाव का लोकपर्व होली
                                                                डॉ. शेखर शंकर मिश्र
भारत की बहुरंगी संस्कृति की विविधता और वैशिष्ट्य को संपूर्णतः आयत्त करने वाला अकेला लोकपर्व है- होली|  पर्व और त्योहार में एक अंतर होता है | त्योहार वर्षभर में कई बार आते हैं | भारत में इस कारण अनेक त्योहार मनाये जाते हैं, अलग-अलग प्रान्तों के अलग-अलग त्योहार, जो भारत की बहुवर्णी संस्कृति के द्योतक हैं किन्तु ‘पर्व’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ही होता है संधि या गाँठ, किसी भी वृक्ष में जहाँ गाँठ होती है वहीँ से कोई नयी प्रशाखा फूटती है | यहाँ हमारा अभिप्राय ऋतुओं की संधि से है | जब एक ऋतु की समाप्ति होने लगती है तो उसका अंतिम पक्ष आनेवाली ऋतु के संक्रमण का होता है | दो ऋतुओं कें संक्रमण के समय ही पर्व मनाये जाते हैं | शिशिर ऋतु के अवसान और ग्रीष्म ऋतु के संक्रमण की वेला में ही होली जैसा समरसता पूर्ण लोकपर्व मनाया जाता है | यह ऋतुराज वसंत का समय है | प्रकृति और जीवन में सर्वत्र उल्लास छाया रहता है | भारतवर्ष में मनाये जानेवाले लगभग सभी पर्वों की कोई न कोई धार्मिक और मिथकीय पृष्ठभूमि अवश्य है | होली के साथ भी ऐसी कुछ कथाएँ कही-सुनी जाती हैं | इसका सम्बन्ध हिरण्यकशिपु की बहन होलिका द्वारा प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठने की कथा से भी जोड़ा जाता है | यह समझ कर कि हरिभक्त प्रह्लाद जलकर मर जाएगा, राक्षसगण नाचने-गाने, मद्यपान करने और शोर मचाकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करने लगे थे | उसी घटना की स्मृति में होली मनाते हैं | यह भी कहा जाता है श्री कृष्ण ने दुष्टों का दलन कर इसी दिन गोपिकाओं के साथ रास रचाया था |   प्रतिवर्ष फाल्गुन पूर्णिमा को मनाये जानेवाले इस पर्व का उल्लेख प्राचीन संस्कृत साहित्य में ‘वसंत महोत्सव’ या ‘मदनोत्सव’ के रूप में भी मिलता है | यह प्राचीन काल से ही समाज के सभी वर्गों और वर्णों की निकटता का पर्व रहा है | होली अकेला पर्व है, जो नगर और ग्राम दोनों स्तरों पर समान भाव से प्रचलित है | इसका मूल कारण है लोक से गहरे स्तरों पर इसका जुड़ा होना |
                                         भारतीय ऋतुचक्र में  मानव जीवन के लिए सर्वाधिक सुखद ऋतु वसंत ही है | शीत-ताप की अनुकूलता इसे खुशनुमा बनाती है | वस्तुतः मानव जीवन वर्ष भर अनेक प्रकार के पारिवारिक और सामाजिक तनावों से ग्रस्त रहता है | आशा-निराशा की धूप-छाँव के बीच सफलता-विफलता के द्वंद्वों से घिरा वह कई मानसिक और शारीरिक कष्ट झेलता है | ऐसे में वसंत ऋतु का कोमल एहसास उसके अंतर्मन को न सिर्फ सुकून देता है बल्कि उसे नूतन चेतना और ऊर्जा से संपन्न भी करता है | वसंत ऋतु में फाल्गुनी पूर्णिमा को मनायी जानेवाली होली उसी एहसास के पारस्परिक प्रकटीकरण का वार्षिक महापर्व है | प्रकृति अपनी स्वाभाविकता में निखर कर मनुष्य के भीतर रागात्मक चेतना जगाने के लिए नयी नवेली दुल्हन-सा शृंगार किए मनुष्य के स्वागत में खड़ी रहती है | प्रकृति के सात रंग जैसे संगीत के सात सुरों मे गा उठते हैं | होली में रंग गाते हैं या सुर रंगीन हो जाते हैं, कुछ कहा नहीं जा सकता|  मगर इतना तो तय है कि रंग गंध और स्वर के मादक सम्मिलन के इस अनोखे पर्व को शब्दों  में आँकना निहायत मुश्किल है | इसे तो जीवन को खुलकर जीनेवाला और जीवन के आनंद-रस को खुलकर पीनेवाला ही बेहतर समझ सकता है |
                                        होली के उमंग और उल्लास की जड़ें बहुत गहरे तक लोक संस्कृति में धंसी हैं | गाँव-जवार की निष्कपट जनता, जिसकी संरक्षिका है | यह आभिजात्य नागर-संस्कृति में व्याप्त  औपचारिक मानवीयता के विरुद्ध स्वच्छंद और नितांत हार्दिक उपक्रम है | समरसता जिसकी पूंजी है, सद्भाव जिसका लक्ष्य|  ‘फाल्गुन’ शब्द ‘फल्’ धातु में ‘गुक्’ प्रत्यय लगाकर बना है | ‘फाल्गुन’ शब्द का ही लोक भाषा रूप ‘फाग’ है, जिसका विकास फल्गु >फग्गु>फागु>फाग के रूप में होता है | लोकजीवन में होली की लोकप्रियता अन्य पर्वों से अधिक है | होली की पूर्व रात्रि में होलिका-दहन की परंपरा है | समस्त उत्तर भारत में होली के पूर्व होनेवाले इस विधान में एकरूपता दिखाई पड़ती है | जबकि दक्षिण प्रान्तों में  होलिका दहन में थोड़ी भिन्नता मिलती है | होलिका-दहन के कारण ही होली को कई दूसरे प्रान्तों में ‘होली दण्ड’ या ‘प्रह्लाद’ नाम से भी जाना जाता है | गाँव और शहर हर जगह होली की पूर्व रात्रि में चौक-चौराहों पर कई दिनों पूर्व से बच्चों के द्वारा इकट्ठी की गयी लकड़ियों और उपलों के ढेर में आग लगाकर उसमें नवान्न की आहुति डालने का विधान है | इस क्रिया के कारण ही इसे ‘नवान्नेष्टि का यज्ञ स्तम्भ’ भी कहा जाता है | होलिका दहन को नवान्नेष्टि यज्ञ के रूप में मनाने का लौकिक कारण है कि उस समय गेहूं, जौ तथा चने की फसल पक कर तैयार हो जाती है और भारतीय लोक संस्कृति में बिना यज्ञाग्नि को समर्पित किये नवान्न ग्रहण नहीं किया जाता | इस कारण फाल्गुन पूर्णिमा को समिधा एकत्र कर उसमें अग्नि का स्थापन कर जौ, गेहूं और चने की बालियों की आहुति देने के बाद ही  किसान खलिहान से अन्न घर ले जाते थे | होली पर्व कृषि युग की देन है | वैदिक ऋचाएँ और संहिताएँ इस तथ्य का प्रमाण हैं| भारतीय संस्कृति के लगभग हरेक पर्व का सम्बन्ध ऋतु-परिवर्तन और फसल कटने से अवश्य है |
                                              होली समाज के प्रत्येक वर्ग जाति और सम्प्रदाय के लोगों को सद्भाव के सूत्र में जोड़ने का एक ऐसा सामूहिक महोत्सव है, जो वैदिक काल से ही प्रचलित है किन्तु जिसकी उमंग में आज तक युगों बाद भी जीवन मूल्यों में हो रहे परिवर्तनों ने कोई व्यवधान नहीं डाला | घर के बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक हरेक आयु-वर्ग के लिए यह आज भी समान आनंद का पर्व है | भारतीय संस्कृति का यह अकेला पर्व है, जिसके केंद्र में कोई देवता नहीं है | इस पर्व में किसी भी देवता की पूजा-अर्चना नहीं होती और न इसके लिए किसी उपवास या अनुष्ठान से गुजरना पड़ता है | इस कारण यह पर्व पूरी तरह धार्मिक अनुशासनों और शास्त्रीय विधानों से मुक्त है | गाँव के लोग होली की अगवानी में महीने दिन पूर्व से ही लग जाते हैं | वसंत पंचमी के दिन से ही ढोल, डफ, मृदंग और झाल पर होली गीत गूंजने लगते हैं | वसंत की मादकता और लोकगीतों की लय का अनोखा संयोग एक अलग वातावरण सिरजने लगता है| होलिका-दहन के बाद सबसे पहले उसकी राख, मिट्टी और कीचड़ से शुरू होती है होली | इस लोक पर्व में  मिट्टी सबसे पहले सद्भाव सम्प्रेषण का माध्यम बनती है फिर रंग और गुलाल अपना असर दिखाते हैं| आप कितने भी बड़े हों, किसी भी वर्ग से आते हों, मिट्टी और कीचड़ आपको अपनी गरिमा के अभिमान के साथ उन तमाम कल्मष और कुंठाओं से मुक्त होने को विवश कर देते हैं | आपके मन में यदि इस अवसर पर लोगों के किसी व्यवहार से रोष उपजता हो तो भी उसे प्रकट करने की इजाजत नहीं है, क्योंकि ‘बुरा न मानो होली है |’
                                               होली रंगों का पर्व है | रंग में ‘आलेपन’ का भाव होता है | वैसे तो समाज में सबके अपने-अपने रंग होते हैं | मगर होली के रंग में सराबोर होने के बाद उन पर सद्भाव का एक अनोखा रंग चढ़ जाता है | यह इतना पक्का और गहरा होता है कि मिटाये नहीं मिटता | होली लोक संस्कृति का पर्व है | इसलिए विभिन्न प्रान्तों की लोक परंपरा में यह अलग-अलग ढंग से मनाई जाती है| यह अवध प्रान्त में चेता और ठुमरी की स्वर लहरियों में निखरती है, वहीं बुंदेलखंड में ईसुरी की फागों के साथ जब बेड़नी के राई-नृत्य की थाप का संयोग होता है तो वहाँ का सम्पूर्ण वातावरण ही जैसे थिरकने लगता है | उत्तराखण्ड में वसंतपंचमी से ही नियमित बैठका में लोक कलाकारों द्वारा होली गायन शुरू हो जाता है | बनारस की होली का तो अंदाज़ ही निराला है | काशी विश्वनाथ के भक्तगण छड़, टिन, थाल, कटोरा, टप, और नगाड़े पर झूमते हुए जब ‘काशी में विश्वनाथ खेलें होली’ की तान छेड़ते हैं तो अपने ओहदे के कारण शालीनता की नाटकीय भंगिमा हमेशा ओढ़े रहनेवाले ‘एलीट’ भी  स्वाभाविक रूप से ‘डिक्लास’ होकर झूमने लगते हैं | होली के मामले में बिहार शायद अकेला प्रान्त है, जहां होली का निरकुंठ भाव सबसे प्रभावशाली ढंग से लोगों के बिंदासपन में ढलता है | पूर्वांचल में जोगीड़ा का प्रचलन है | बिहार के हरेक गाँव में भी जोगीड़ा गाने वालों का एक दल जरूर होता है, जो इस अवसर पर अपने गीतों से किसी ‘चुप्पे’ आदमी को भी गाने पर मजबूर कर सकता है | होली निश्छल और निष्कलुष प्रेम की अभिव्यक्ति का सामूहिक उत्सव है | आज पश्चिम से आयातित प्रेम-त्योहार वेलेंटाइन को हमें घुट्टी की तरह पिलाया जा रहा है, जिसमें मीडिया की भूमिका सबसे अहम है |  प्रेम के इस बाजारवादी रूप  का सबसे अधिक  संपोषण कार्पोरेट घराने कर रहे हैं क्योंकि इसके पीछे उनके अरबों के व्यवसाय का स्वार्थ छिपा है | तभी तो धीरे-धीरे वेलेंटाइन-डे का फैलाव पूरे हफ्ते भर तक करने का विधान किया जारहा है| रोज-डे, प्रपोज-डे, चॉकलेट-डे, टेडी बीयर-डे, हग-डे और किस-डे आदि के साथ वेलेंटाइन के इस साप्ताहिक प्रेमानुष्ठान में पूरे विश्व में इस अकेले दिन हजारों करोड़ का कारोबार होता है | अमेरिका की ग्रीटिंग्स कार्ड एसोसिएशन का आंकड़ा है कि इस वर्ष एक अरब से अधिक ग्रीटिंग्स कार्ड खरीदे और बेचे गए हैं | भारतीय संस्कृति में वसंतोत्सव और मदनोत्सव के रूप में प्रसिद्ध होली प्रेम और सौहार्द के पारस्परिक आदान-प्रदान का एक ऐसा अनूठा पर्व है, जो किसी भी व्यक्ति पर बिना आरोपित किए  भावनाओं के आवेग में स्वतःस्फूर्त ही घटित होता है |
                                           रंग-उमंग, मस्ती और बिंदासपन के इस लोक पर्व को खुले मन से मनाने पर ही हमारे मन के भीतर का कल्मष छंटेगा और वर्जनाओं की दीवारों को भेदकर मानवता और प्रेम का सही सन्देश हम पूरी दुनिया को दे पायेंगे |

Friday, 12 July 2013

“साथ मेरे चल रही है इत्र में डूबी हवा........”

कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह की जन्मतिथि 12 जुलाई पर विशेष


साहित्य को अपना सम्पूर्ण जीवन देने वाले, एक सम्पूर्ण गीतिमय व्यक्तित्व कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह का स्मरण आते ही यहाँ की फिजाओं में तैरते उनके उनके गीत की अनुगूंज भी साफ़ सुनाई देती है – “साथ मेरे चल रही है, इत्र में डूबी हवा / तो अकेला मैं नहीं हूँ, मैं नहीं हूँ, मैं नहीं हूँ |” हिंदी गीत के बदलते स्वरूप और उसकी संरचना में गीत का एक नया विकास देखते हुए कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने उसका नामकरण ‘नवगीत’किया | उनके द्वारा निर्दिष्ट ‘नवगीत’ का मूल स्वभाव ‘मनोलय’ आज उन्हीं के गीत की लगातार कायम अनुगूंज के साथ सिद्ध हो रहा है | कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह के रचना कर्म का अधिकांश गीत रचना और गीत विधा के नव्यतर विकास तथा उसके प्रभाव विश्लेषण में व्यतीत हुआ है | नवगीत का स्वीकृति-संघर्ष हो या जन सांस्कृतिक मानवीय संस्कार और संघर्ष-शक्ति से अनुप्राणित जनबोधी गीत तक की उनकी रचना यात्रा में हमेशा ही बदलते शिल्प और विचार –दर्शन का आह्वान ही दिखाई पड़ता रहा |
कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने 1958 में नवगीत के प्रथम संकलन ‘गीतांगिनी’ का सम्पादन किया और परम्परित गीत रचना से भिन्न आधुनिक भावबोध और शिल्प बोध से संपन्न नए गीतों को ‘नवगीत’ के रूप में हिन्दी साहित्य में स्वीकृति दिलायी | उन्होंने स्वयं द्वारा संपादित नवगीत के प्रथम संकलन ‘गीतांगिनी’के सम्पादकीय के रूप में नवगीत का घोषणा-पत्र प्रस्तुत करते हुए उसके पांच विकासशील तत्वों को निरूपित किया | वे हैं- जीवन दर्शन,आत्म निष्ठा, व्यक्तित्व बोध,प्रीति तत्व और परिसंचय | कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने नवगीत विश्लेषण के क्रम में ‘शब्द की लय’ की अपेक्षा ‘अर्थ लय’और उससे कहीं अधिक ‘मनोलय’ को महत्वपूर्ण माना है |
कवि की प्रथम नवगीत कृति ‘आओ खुली बयार’ 1962 में प्रकाशित हुई,जिसमें कवि के आधुनिकता बोध की संवेदनापूर्ण अभिव्यक्ति हुई है | इस संग्रह में संकलित ‘आरोही का गीत’ की कुछ पंक्तियाँ-लालसा पहाड़ की फसल /ढाल-ढाल झूमती हुई / बाढ़ से बची रहे मगर / मेघों को चूमती हुई / ज़िन्दगी खुदी नहीं / रेत की नदी नहीं /प्यार धार बाँध का झरे / तुम भरी-भरी लगीं मुझे /धुंध से जभी निकल पड़ीं | 1980 में उनकी दूसरी नवगीत कृति ‘भरी सड़क पर’ प्रकाशित हुई,जिसमें कवि के शब्दों में मध्यम वर्गीय जीवनानुभव और जिजीविषा की अभिव्यंजना करने वाले गीत हैं तथा मानवीयता की सहसंघर्षी अनुभव-दृष्टि भी है | 1981 में ‘रात आंख मूंदकर जगी’ का प्रकाशन हुआ, जिसकी रचनाएं प्रायः तीन दशकों में बदलती वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक और रचनात्मक मूल्य बोधों के तापमान में ढली हैं | इसमें प्रेमपरक नवगीत भी संकलित हैं, जो आस्वाद के धरातल पर पिछले नवगीतों से पर्याप्त भिन्न हैं | 1982 में इस जनपक्षधर कवि के जनबोधी गीतों का संग्रह ‘गजर आधी रात का’ प्रकाशित हुआ | इस संग्रह के जन संस्कार गीत शिल्प- सौन्दर्य की दृष्टि से अनुपम हैं | सोहर, मुंडन गीत,परिछन, बँटगवनी ही नहीं इसमें सामूहिक श्रम गान भी संकलित हैं |
राजेन्द्र प्रसाद सिंह की गीत रचनाओं का ठोस वैचारिक आधार है | कारण है मात्र भारतीय संस्कृति और साहित्य ही नहीं विश्व स्तर पर विकसित तमाम प्राचीन-अर्वाचीन साहित्य और ज्ञान धाराओं के वे गहरे अध्येता रहे | उन्होंने साहित्य में यथास्थितिवादियों, उपभोक्ता संस्कृति के परिचारकों और उनकी रचनाशीलता का हमेशा विरोध किया | वे नवगीत और आधुनिक कविता में जनपक्षधर रचनाशीलता के संवाहकों में अगली पंक्ति के रचनाकारों में से थे | उनकी अंतिम नवगीत कृति ‘लाल नील धारा’ में वैचारिक और कलागत उत्कर्ष गीत की सतत् पुनर्नवता को सिद्ध करता है –बालू के द्वीप श्रृंखला हैं / अब अभाव में घुटी नदी /गिद्धों को नाव सौंप दूं, या/ कच्छप बन सहूँ त्रासदी ?
आज कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह नहीं हैं मगर अपनी सतत् पुनर्नवता को बराबर सिद्ध करते उनके नवगीत नयी रचनाशीलता को हमेशा दिशा देते रहेंगे और जीवन की अंतिम सांस तक सक्रिय एक रचनाकार को हमारी स्मृति और चर्चा से कभी ओझल नहीं होने देंगे |

Sunday, 23 June 2013

आँखों में तैरता मौत का मंजर

उत्तराखंड में आये प्रलय के बाद लगातार मौसम और पानी के थपेड़ों के बीच विकृत हो गयीं हज़ारों लाशों में आज किसी व्यक्ति की शिनाख्त निहायत मुश्किल है | मगर सेना उन लाशों के बीच ज़िन्दगी को उम्मीद देती बची हुई सांसें और धड़कनें तलाश कर घायलों को बचाने में जी-जान से जुटी है | उत्तराखंड में जल प्रलय के बाद हज़ारों जिंदगियां बचाने की जद्दोजहद के बीच क्षेत्रीय और केन्द्रीय सरकार ने पहली बार माना कि बचाव कार्य में जुटे विभागों के बीच तालमेल की कमी है | मगर सेना लोगों को मौत के मुँह से निकालने के हर संभव प्रयास कर रही है | जिंदगियां बचाने की कोशिशों को पूरे समर्पण के साथ अंजाम देती भारतीय सेना को हमारा हार्दिक नमन !
शनिवार की दोपहर मुज़फ्फरपुर के जूरन छपरा रोड नं.4 के निवासी डॉ. शोभा रानी मिश्र और एन.के.मिश्र के बहन-बहनोई धीरेन्द्र ठाकुर एवं उनकी पत्नी रेणु ठाकुर उत्तराखंड के हादसे के बाद सकुशल मुजफ्फरपुर पहुंचे हैं | ठाकुर दम्पति ने उस खौफनाक मंज़र का आँखों देखा हाल बयां करते हुए बताया कि हमलोग बच गए हैं ....मगर अब भी आँखों के सामने वही भयावह मंज़र घूम रहा है |... एक बार जैसे बल्ब फ्यूज होता है और अन्धकार छा जाता है, ठीक वैसे ही हमारा दिमाग सुन्न हो गया था | ज़िन्दगी और मौत के बीच जैसे एक पल की दूरी रह गयी थी | सब अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे | मदद की गुहार सुनने के लिए कौन रुक रहा है ...इतनी मोहलत ज़िन्दगी दे कहाँ रही थी ? श्री ठाकुर ने बताया कि 17 जून को गौरी कुंड पहुँचने के लिए निकले थे, गुप्तकाशी से आगे थे कि अचानक बादल फटने की तेज आवाज हुई और साथ में लौट आने का एनाउन्समेंट किया जाने लगा | हमलोग सात किलोमीटर नीचे उतरे तभी मन्दाकिनी कटने लगी | हम फिर से 4 किलोमीटर ऊपर चढ़कर आये | गुप्त काशी के निचले भाग में हमें पनाह मिली, जहां तीन रातें गुजारीं | ऐसा लगता था कि वहाँ से निकल ही नहीं पायेंगे | मगर ईश्वर को शायद हमें बचाना था, तभी उस दिन हमें निकलने में चार-पांच घंटे लेट हो गए, वापसी का टिकट कैंसिल कराना था इसलिए हमें देरी हो गयी और पूरी चढ़ाई नहीं चढ़ पाए, जो चढ़ गए थे, वे सभी मौत के मुँह में समा गए | गुरुवार एक बजे हम गुप्तकाशी से निकले और शुक्रवार को हरिद्वार से हमने ट्रेन पकड़ी और और आज यहाँ पहुंचे हैं | अभी भी यकीन नहीं होता कि हम उस हादसे से निकल कर वापस आ गए हैं | अब तक टीवी चैनलों और अखबारों के माध्यम से जितनी जानकारी मिल पायी थी, मगर ठाकुर दम्पति की जुबानी सुनने पर वह खौफनाक मंज़र लगा जैसे आँखों के सामने घटित हो रहा है |
उत्तराखंड से लगातार मिल रही प्रकृति की विनाशलीला की तस्वीरें और ख़बरें ह्रदय विदारक हैं और स्तब्धकारी भी | मगर इसे एक प्रकोप कहकर इसके लिए हम प्रकृति को दोष नहीं दे सकते | पर्यावरण विश्लेषकों का मानना है कि यह तबाही उदारीकरण के बाद के दशकों से उत्तराखंड में अंधाधुंध हुए प्रकृति के दोहन का परिणाम है | यह घटना हमारे लिए एक भयावह भविष्य का संकेतक भी है | समय रहते यदि हमने प्रकृति के साथ लगातार हो रहे मानवीय खिलवाड़ को नहीं रोका तो वह दिन दूर नहीं जब इससे भी बड़े हादसे हमें झेलने होंगे और कौन जाने अगले कोई बड़े प्रलय में धरती से मानव का अस्तित्व ही मिट जाए |



Tuesday, 12 February 2013

आचार्यत्व और कवित्व के सारस्वत प्रतिमान

जयंती पर विशेष  

आचार्यत्व और कवित्व के सारस्वत प्रतिमान
महाकवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री


आधुनिक हिंदी साहित्य के शिखर-पुरुष महाकवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री [माघ शुक्ल द्वितीया 1916 -07 अप्रैल 2011] आचार्यत्व और कवित्व के सारस्वत स्वरूप थे | उत्तर छायावाद के अग्रणी कवि आचार्य प्रवर निरंतर सात दशकों तक साहित्य रचना में सक्रिय रहे | इस बीच हिंदी गीत-कविता ने विचार और शिल्प के अनेक परिवर्तनों को देखा | महाकवि ने गीत-कविता की हरेक बदलती भंगिमा को समयानुरूप अपनी रचनाशीलता में आत्मसात किया | अनेक अर्थच्छवियां उकेरतीं उनकी बहुविध रचनाएं इस तथ्य का जीवंत प्रमाण हैं |
                        हिंदी काव्य जगत में जब आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री का आगमन हुआ, उस समय एक ओर छायावाद का अवसान हो रहा था दूसरी ओर नवकाव्य धारा में प्रगति के स्वर भी मुखर हो रहे थे | शास्त्री जी के व्यक्तित्व में प्राच्यविद्या के ज्ञान से मंडित प्रतिभा और पांडित्य का अपूर्व संवलन रहा है | हिंदी काव्य क्षेत्र में उनकी सारस्वत प्रतिभा ने निरंतर नयेपन को ही अपना लक्ष्य बनाया |
                      भारतीय संस्कृति का सबसे जीवंत स्वरूप अपनी सम्पूर्ण गरिमा के साथ महाकवि जयशंकर प्रसाद के पश्चात् शास्त्री जी में ही दृष्टिगत होता है | भारत की अजस्र सांस्कृतिक धारा के वे अन्यतम कवि थे | वे मात्र अपने वेदांत दर्शन के ज्ञान के कारण ही नहीं, अपितु अपनी व्यापक लोकदृष्टि के कारण भी विशिष्ट थे | उत्तर छायावाद के प्रमुख काव्यकार महाकवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री की रचनाओं में एक ओर कलात्मक समृद्धि मिलती है, तो दूसरी ओर समय के सत्य की यथार्थ अभिव्यक्ति की ईमानदारी भी | आचार्य शास्त्री की प्रथम काव्यकृति ‘काकली’ का प्रकाशन 1935 में हुआ | शास्त्री जी को छायावादी कवियों का रचना-शिल्प अपनी ओर खींच रहा था | संस्कृत-साहित्य के अगाध ज्ञान के साथ जब हिंदी काव्य के आकर्षण का संयोग हुआ, तो काव्य-रचना की विलक्षण और वेगवती धारा फूट पड़ी, जो लगातार परवान चढ़ती रही | विभिन्न काव्यान्दोलनों के बीच भी उनकी रचनाशीलता निर्द्वंद्व और निर्वादी बनी रही |
                   प्रेम की मार्मिक अभिव्यंजना उनकी रचनाओं में भावानुभूति के चरम पर दृष्टिगत होती है –
                                                “नयन में प्राण में तुम हो,
                                                 गगन में गान में तुम हो,
                                                 न इतना भी रहा अंतर कि
                                                 मैं हूँ या तुम्हीं तुम हो |” 
शास्त्री जी के कुछ गीत आपनी प्रेमानुभूति के कारण रसज्ञ समाज के बीच सर्वाधिक लोकप्रिय हुए हैं, उनमें से एक है-
                                                 “किसने बांसुरी बजाई ?
                                                  जनम-जनम की पहचानी यह तान कहाँ से आई !
                                                  अंग-अंग फूले कदम्ब सम, सांस झकोरे झूले,
                                                  सूखी आँखों में यमुना की लोल लहर लहराई |”