रंग-बिरंगे
गुलाल से पटी एक सड़क
उत्तर बिहार में
मुजफ्फरपुर शहर की होली अपने प्रगाढ़ साम्प्रदायिक सद्भाव के गहरे और अमिट रंग के
कारण प्रसिद्ध है | यहाँ की होली की कुछ ख़ास विशेषताएँ हैं, जो इसे अन्य शहरों में
भी चर्चा का विषय बनाए रखती हैं | यहाँ होली के महीने दिन पूर्व से ही विभिन्न सामाजिक
सांस्कृतिक संगठनों द्वारा आयोजित ‘होली मिलन समारोह’ में सभी सम्प्रदायों और
तबकों की जुटने वाली भीड़ को औपचारिकता का जामा देकर यदि छोड़ भी दें तो होली के ऐन
दिन गोधूलि वेला से रात उतरने के पहले सरैयागंज टावर से चतुर्भुज स्थान मंदिर तक जानेवाली
सड़क का रंग-बिरंगे गुलाल से पट जाना बरबस ही लोगों को उन पुराने दिनों की याद ताज़ा
करा देता है, जब मुजफ्फरपुर के सुप्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी, नाटककार और अभिनेता स्व.ललित
कुमार सिंह ‘नटवर’ ने गंगा-जमुनी तहजीब वाले इस शहर को सद्भाव का यह अनोखा रंग
दिया होगा |
कभी
मैंने मुजफ्फरपुर शहर पर केन्द्रित अपनी कविता में लिखा था –“कुछ है, जो बाहर
से ही दीख जाता है / इस शहर में / शाम होते ही नृत्य-गीत से गुलज़ार एक सड़क / मजार
से शुरू होकर मंदिर तक जाती है / और रात गये कई छोटी-छोटी गलियों में खो जाती है, जिसे
हर सुबह ढूंढ कर निकाल लाते हैं / पुलिस और पत्रकार |” बिहार के विख्यात फकीर दाता
कम्बल शाह का मज़ार और दो सौ साल से भी
अधिक पुराना चतुर्भुज स्थान मंदिर इसी सड़क के हिस्से हैं और उन दोनों के बीच वर्षों
से गुलज़ार हैं यहाँ तवायफों का एक पूरा मोहल्ला | शहर के इस हिस्से की जुबान बनारसी है और अंदाज़
लखनवी | यहाँ ईद भी होती है और छठ के अवसर पर पूरे व्रत-उपवास के साथ भगवान आदित्य
की आराधना का अनुष्ठान भी | होली अन्य शहरों में भी होती है | मगर रंग-गुलाल से पटी
सड़कें केवल यहीं देखने को मिलती हैं | कभी नवयुवक समिति के संस्थापक ललित कुमार
सिंह ‘नटवर’ ने इस परंपरा का सूत्रपात किया था | तब नगर के गणमान्य बुद्धिजीवी
साहित्यकार, पत्रकार और व्यवसायियों के साथ शहर के हरेक वर्ग और सम्प्रदाय के लोग इसमें
शामिल होते थे | इसी सड़क से उनकी टोली एक दूसरे को गुलाल लगाती गुजरती थी | इस सड़क
से मिलने वाली हरेक गली के मुहाने पर जिले के दूर दराज क्षेत्रों के लोग खड़े
मिलते, एक दूसरे को गुलाल लगाते, गले मिलते और फिर उस टोली का हिस्सा बन जाते |
होली में हरेक परिचित के यहाँ जाना संभव नहीं था इसलिए सबसे मिलने का इससे बेहतर
स्थान दूसरा नहीं था | पहले सरैयागंज टावर से चलकर गरीबनाथ धाम में शिवलिंग का
गुलाल से अभिषेक, सोनारपट्टी में ठंढई का
दौर फिर कम्बल शाह मजार पर इबादत और तब
चतुर्भुज स्थान मंदिर में स्थापित चतुर्भुज विष्णु को अबीर-अर्पण | सबके चेहरे पर होली
का उल्लास और मस्ती, विभिन्न रंगों के अबीर से मिलकर बना एक नया मटमैला रंग, यही
है अपनी मिट्टी से उपजा सद्भाव का सोंधा रंग “विविध रंग मिलि एक बरन भये” |
इस नगर
की संरचना में विभिन्न सम्प्रदायों के परस्पर सद्भाव की एक अप्रत्यक्ष बुनावट है, जिसके
धागे भले ही रेशमी हों मगर पारस्परिक कसाव ऐसा है कि राज्य और देश के अन्य क्षेत्रों
की किसी भी उन्मादी लहर का कोई असर यहाँ
नहीं होता | यहाँ दुःख और गम, आनंद और उल्लास का बस एक ही मजहब है- इंसानियत - “मंदिर
की घंटियों में जब घुलती है / मस्जिद की अजान / गिरजा की प्रार्थना में, गुरद्वारे
के सबद / इसी समवेत से सुबह-सुबह जगता है यह उनींदा शहर | इस शहर में चिड़ियों को
मालूम नहीं है गुम्बदों का फर्क / यहाँ दुःख और गम, आनंद और उल्लास का कोई मज़हब
नहीं है |”
ईश्वर गंगा-जमुनी तहजीब के इस शहर को
बुरी नज़र से बचाये | इसके सद्भाव का रंग हमेशा चटक बना रहे | अपने सभी मित्रों को रंग
और उल्लास के पर्व होली की हार्दिक शुभकामनाएँ |
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