Saturday, 26 January 2013

‘गणतंत्र’ का अर्थ



‘गणतंत्र’ का अर्थ

गणतंत्र दिवस के अवसर पर,भारत, भारतीयता के स्वाभिमान और सम्पूर्ण देश में व्याप्त एकता और अखंडता के प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष सूत्र को मेरा नमन और अपने सभी मित्रों को भारतीय गणतंत्र की 63 वीं वर्षगाँठ की हार्दिक शुभकामनाएँ !
                                       15 अगस्त 1947 को  हमने आज़ादी का जश्न मनाया था और भारत राष्ट्र की आशाओं,उम्मीदों को मूर्त रूप देने देने के लिए 26 जनवरी 1950 को एक सर्वसम्मत संविधान लागू हुआ | आज जिसके उद्देश्य को एक बार फिर स्मरण और आत्मसात करने की आवश्यकता है –
 “हम भारत के लोग,भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न,समाजवादी,पंथ निरपेक्ष,लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक न्याय विचार, अभिव्यक्ति,विश्वास,धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमे में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ-संकल्प लेकर इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं |”
                                        मित्रो,आज़ादी या स्वाधीनता निरंकुश भी बनाती है,जिससे अराजकता का जन्म होता है | हम बीते 63 वर्षों के प्रौढ़ गणतंत्र के नागरिक हैं | किन्तु ‘गण’ के साथ ‘तंत्र’ का समुचित सामंजस्य अब भी हमारा आकांक्षित लक्ष्य बना हुआ है | कभी कवि ‘धूमिल’ ने सवाल किया था –
                                    “ आज़ादी क्या तीन थके हुए रंगों का नाम है,
                                      जिन्हें एक पहिया ढोता है
                                      या कि इसका कोई खास मतलब होता है ?”
गणतंत्र आज़ादी के इस सही मतलब को पहचान देने की प्रक्रिया का नाम है, हम आज भी इस पहचान के लिए संघर्षरत हैं | आज 63 वर्षों में भी देश की बहुसंख्य जनता और विशेष रूप से देश की लगभग आधी आबादी कहा जानेवाला स्त्री-वर्ग असुरक्षा और आतंक के साये में जी रहा है | तो फिर इस गणतंत्र का  कोई अर्थ नहीं रह जाता | भारत की 60 प्रतिशत जनसंख्या 18 से 45 वर्ष के युवाओं की है ,जिसके बल पर भारत एक युवा राष्ट्र कहा जाता है | इस युवा शक्ति की अथाह ऊर्जा को सकारात्मक और सृजनधर्मी दिशा मिले तभी हमारा गणतंत्र सार्थक होगा |   


Wednesday, 2 January 2013

नया साल : कुछ अनुभव प्रसंग



नया साल : कुछ अनुभव प्रसंग

    1.
हाथ का आंवला नहीं था
पारे की तरह था समय
मुट्ठी बंद करते ही
बिखर कर फिसल गया
कई छोटी-छोटी बूंदों में
जैसे आईना हाथ से
छूट कर बिखर गया हो कई किरचों में
सब में टूटा हुआ कई टुकड़ों में एक ही चेहरा
बेतरह दंश देती कुछ ऐसी स्मृतियों के साथ
जिन्हें सहेजने में उंगली छिल जाने
रक्त निकल आने का भय है |
    2.
कुछ न कुछ बदलेगा जरूर
क्यों कि बदल गया है मौसम
दीवारों पर टंग गए हैं
हरे-भरे दृश्यों वाले नये कैलेण्डर
कुछ और रंगीन हो गए हैं
डालियों पर धूप सेंकती तितलियों के पंख
तेज सर्द हवाओं से जड़ों तक
काँप रहे हैं पुराने पेड़ |
पेंशन की क़तार में थक कर बैठ गयी 
एक वृद्धा सोचती है -
मरते खपते ही सही
गुजर ही गया एक और साल
पुरानी हवेली के रोशनदान में
गौरैया ने बना लिया है एक नया घोंसला
और हमारे कस्बे में साल बदल गया है |
    3.
जब शहर की तमाम घड़ियाँ
कभी तेज- सुस्त क़दमों से चलती हुई
इकट्ठी हो रहीं थीं
उस कोहरे की झील के इर्द-गिर्द
मैं सारी रात अपनी कविता में
उन प्रसूताओं की चीख सुन रहा था,
जिनके भ्रूण निष्पंद हो रहे थे
सर्द सड़कों पर |
ऐसे में कब आ गया नया साल
और मेरी कविता की उंगली पकड़ कर
खड़ा हो गया मालूम नहीं |
     4.
हमारे कस्बे में साल बदल गया है
पिता से ज्यादा माँ की फिक्र में बड़े होते बच्चे
आकाश में उडती पतंगों को देखकर
भूलने लगे हैं ‘होम वर्क’ |
घर की ज़रूरतों से जूझती
बूढ़ी हो रहीं हैं कई गृहिणियां
रात उतरने से पहले
स्ट्रीट लाइट में बैड मिंटन का मैदान हो रहीं हैं सड़कें
अब भी बुजुर्गों के चेहरे पर है एक निचाट खालीपन |
पंचांग वाले कैलेण्डर में लोग बेसब्री से ढूंढ रहे हैं
नये साल में अपना भविष्य
पार्क भर गए हैं आज्ञाकारी पतियों,
संतुष्ट पत्नियों और उत्साही बच्चों से
नशा चढ़ रहा है युवकों की आँखों में
युवतियों की मुस्कराहट में समय से पहले ही
उतर रहा है – वसंत |
आकाश में उड़ रहे हैं
बच्चों के हाथ से छूट गए कुछ गुब्बारे
धीरे- धीरे सबको पता चल रहा है
कि हमारे कस्बे में साल बदल गया है |
    
                 ***