‘गणतंत्र’ का अर्थ
गणतंत्र दिवस के अवसर पर,भारत, भारतीयता के स्वाभिमान और
सम्पूर्ण देश में व्याप्त एकता और अखंडता के प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष सूत्र को मेरा
नमन और अपने सभी मित्रों को भारतीय गणतंत्र की 63 वीं वर्षगाँठ की हार्दिक
शुभकामनाएँ !
15 अगस्त
1947 को हमने आज़ादी का जश्न मनाया था और भारत राष्ट्र की आशाओं,उम्मीदों को मूर्त रूप
देने देने के लिए 26 जनवरी 1950 को एक सर्वसम्मत संविधान लागू हुआ | आज जिसके
उद्देश्य को एक बार फिर स्मरण और आत्मसात करने की आवश्यकता है –
“हम भारत के
लोग,भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न,समाजवादी,पंथ निरपेक्ष,लोकतंत्रात्मक
गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक
न्याय विचार, अभिव्यक्ति,विश्वास,धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर
की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमे में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता
और अखंडता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ-संकल्प लेकर इस संविधान को
अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं |”
मित्रो,आज़ादी या स्वाधीनता
निरंकुश भी बनाती है,जिससे अराजकता का जन्म होता है | हम बीते 63 वर्षों के प्रौढ़
गणतंत्र के नागरिक हैं | किन्तु ‘गण’ के साथ ‘तंत्र’ का समुचित सामंजस्य अब भी
हमारा आकांक्षित लक्ष्य बना हुआ है | कभी कवि ‘धूमिल’ ने सवाल किया था –
“ आज़ादी
क्या तीन थके हुए रंगों का नाम है,
जिन्हें
एक पहिया ढोता है
या कि
इसका कोई खास मतलब होता है ?”
गणतंत्र आज़ादी के इस सही मतलब को पहचान देने की प्रक्रिया
का नाम है, हम आज भी इस पहचान के लिए संघर्षरत हैं | आज 63 वर्षों में भी देश की
बहुसंख्य जनता और विशेष रूप से देश की लगभग आधी आबादी कहा जानेवाला स्त्री-वर्ग
असुरक्षा और आतंक के साये में जी रहा है | तो फिर इस गणतंत्र का कोई अर्थ नहीं रह जाता | भारत की 60 प्रतिशत
जनसंख्या 18 से 45 वर्ष के युवाओं की है ,जिसके बल पर भारत एक युवा राष्ट्र कहा
जाता है | इस युवा शक्ति की अथाह ऊर्जा को सकारात्मक और सृजनधर्मी दिशा मिले तभी
हमारा गणतंत्र सार्थक होगा |
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