नया साल : कुछ अनुभव प्रसंग
1.
हाथ का आंवला नहीं था
पारे की तरह था समय
मुट्ठी बंद करते ही
बिखर कर फिसल गया
कई छोटी-छोटी बूंदों में
जैसे आईना हाथ से
छूट कर बिखर गया हो कई किरचों में
सब में टूटा हुआ कई टुकड़ों में एक ही चेहरा
बेतरह दंश देती कुछ ऐसी स्मृतियों के साथ
जिन्हें सहेजने में उंगली छिल जाने
रक्त निकल आने का भय है |
2.
कुछ न कुछ बदलेगा जरूर
क्यों कि बदल गया है मौसम
दीवारों पर टंग गए हैं
हरे-भरे दृश्यों वाले नये कैलेण्डर
कुछ और रंगीन हो गए हैं
डालियों पर धूप सेंकती तितलियों के पंख
तेज सर्द हवाओं से जड़ों तक
काँप रहे हैं पुराने पेड़ |
पेंशन की क़तार में थक कर बैठ गयी
एक वृद्धा सोचती है -
मरते खपते ही सही
गुजर ही गया एक और साल
पुरानी हवेली के रोशनदान में
गौरैया ने बना लिया है एक नया घोंसला
और हमारे कस्बे में साल बदल गया है |
3.
जब शहर की तमाम घड़ियाँ
कभी तेज- सुस्त क़दमों से चलती हुई
इकट्ठी हो रहीं थीं
उस कोहरे की झील के इर्द-गिर्द
मैं सारी रात अपनी कविता में
उन प्रसूताओं की चीख सुन रहा था,
जिनके भ्रूण निष्पंद हो रहे थे
सर्द सड़कों पर |
ऐसे में कब आ गया नया साल
और मेरी कविता की उंगली पकड़ कर
खड़ा हो गया मालूम नहीं |
4.
हमारे कस्बे में साल बदल गया है
पिता से ज्यादा माँ की फिक्र में बड़े होते बच्चे
आकाश में उडती पतंगों को देखकर
भूलने लगे हैं ‘होम वर्क’ |
घर की ज़रूरतों से जूझती
बूढ़ी हो रहीं हैं कई गृहिणियां
रात उतरने से पहले
स्ट्रीट लाइट में बैड मिंटन का मैदान हो रहीं हैं सड़कें
अब भी बुजुर्गों के चेहरे पर है एक निचाट खालीपन |
पंचांग वाले कैलेण्डर में लोग बेसब्री से ढूंढ रहे हैं
नये साल में अपना भविष्य
पार्क भर गए हैं आज्ञाकारी पतियों,
संतुष्ट पत्नियों और उत्साही बच्चों से
नशा चढ़ रहा है युवकों की आँखों में
युवतियों की मुस्कराहट में समय से पहले ही
उतर रहा है – वसंत |
आकाश में उड़ रहे हैं
बच्चों के हाथ से छूट गए कुछ गुब्बारे
धीरे- धीरे सबको पता चल रहा है
कि हमारे कस्बे में साल बदल गया है |
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