बिहार खादी आन्दोलन के सूत्रधार : ध्वजा प्रसाद साहू
महात्मा गांधी के आदर्शों के अनुयायी,महान स्वतंत्रता
सेनानी तथा बिहार में खादी आन्दोलन के प्रतिष्ठापक ध्वजा प्रसाद साहू की 26 वीं
पुण्य तिथि है | दो युग से भी ज्यादा बीत गए ध्वजा बाबू को गुजरे | मगर हर वर्ष
शहर के गणमान्य लोग उनके यशःकाय व्यक्तित्व को नमन करने मुजफ्फरपुर के हाथी चौक
स्थित उनके प्रतिमा-स्थल पर एकत्र होते हैं | जब भी ध्वजा बाबू की बात होती है तो
स्वाधीनता आन्दोलन और खासतौर से खादी आन्दोलन की बात अवश्य होती है | हम उस युग के
पूरे परिदृश्य पर नज़र डालें तो उस युग में गाँधी के व्यक्तित्व का कुछ ऐसा आकर्षण था कि रचनात्मक
सोच का लगभग सम्पूर्ण युवा जनमानस उनके प्रभाव में था | मगर कुछ ऐसे भी युवा थे,
जिन्हें गांधी अपने विचारों के परीक्षण की प्रयोगशाला मानते थे | ध्वजा बाबू
उन्हीं लोगों में से एक थे,जो गांधी –परिवार में बिहार का प्रतिनिधित्व कर रहे थे
| जिनसे हमेशा गांधी का संवाद बना रहता था
| एक तरह से कहें तो गांधी के सिद्धांतों और उनके वैचारिक दर्शन के व्यवहार की
कसौटी ध्वजा बाबू सरीखे लोग ही थे | ध्वजा बाबू ने गांधी का अनुसरण किया तो उसके
पहले वे एक विचार मंथन से गुजरे,पहले उनकी सोच थोड़ी अलग थी, वे गरम दल के सदस्य थे
| 1917 में गांधी के बिहार आगमन के समय जब उनका साक्षात्कार गांधी से हुआ ध्वजा
बाबू की सोच बदली| गांधी ने ध्वजा बाबू की निष्ठा और लगन देखकर
बिहार में उन्हें खादी का काम आगे बढाने का कार्य सौंपा | जिस काम में ध्वजा बाबू
पूरी लगन से जुट गए | ध्वजा बाबू की रचनात्मक
सोच कैसी थी ? यह उनके वैचारिक आलेखों से
पता चलता है | उनका एक लेख है – ‘ बेकारी की समस्या का निदान और खादी ग्रामोद्योग
का योगदान’ जिसमें उन्होंने लिखा है –“यों तो सभी देशों में बेकारी की समस्या
न्यूनाधिक बनी ही रहती है | हमारे देश में विशेषकर बिहार प्रदेश में बेकारी एक
गंभीर समस्या बनकर उपस्थित हुई है | यहाँ भूमिहीन मजदूरों की सर्वाधिक संख्या है |
जिनके पास ज़मीन है वे उनके श्रम का लाभ उठाते हैं और श्रम कानून के हिसाब से
उन्हें मजदूरी भी नहीं मिलती | उनके लिए वैकल्पिक धंधा अम्बर चरखा और करघा हो सकता
है | देश की आधी जनसँख्या स्त्रियों की है,जिनमें से अधिकांश के पूरे दिन का समय
बिना किसी उत्पादन के नष्ट होता है |” ध्वजा बाबू ने स्त्रियों के लिए खादी उद्योग
में कताई का काम सबसे उपयुक्त माना था |
पढ़े लिखे
समाज में ध्वजा बाबू की लोकप्रियता का कारण उनके वैचारिक आलेख भी बने जो उस समय
देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर छपते थे |
ध्वजा बाबू सम्पूर्ण रूप से एक महामानव
थे, जिनके हृदय में सम्पूर्ण देश की जनता का दर्द बसता था तथा जिनके निदान के लिए
वे आजीवन संघर्ष करते रहे | मैं उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ |

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