कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह की जन्मतिथि 12 जुलाई पर विशेष
साहित्य को अपना सम्पूर्ण जीवन देने वाले, एक सम्पूर्ण गीतिमय व्यक्तित्व कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह का स्मरण आते ही यहाँ की फिजाओं में तैरते उनके उनके गीत की अनुगूंज भी साफ़ सुनाई देती है – “साथ मेरे चल रही है, इत्र में डूबी हवा / तो अकेला मैं नहीं हूँ, मैं नहीं हूँ, मैं नहीं हूँ |” हिंदी गीत के बदलते स्वरूप और उसकी संरचना में गीत का एक नया विकास देखते हुए कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने उसका नामकरण ‘नवगीत’किया | उनके द्वारा निर्दिष्ट ‘नवगीत’ का मूल स्वभाव ‘मनोलय’ आज उन्हीं के गीत की लगातार कायम अनुगूंज के साथ सिद्ध हो रहा है | कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह के रचना कर्म का अधिकांश गीत रचना और गीत विधा के नव्यतर विकास तथा उसके प्रभाव विश्लेषण में व्यतीत हुआ है | नवगीत का स्वीकृति-संघर्ष हो या जन सांस्कृतिक मानवीय संस्कार और संघर्ष-शक्ति से अनुप्राणित जनबोधी गीत तक की उनकी रचना यात्रा में हमेशा ही बदलते शिल्प और विचार –दर्शन का आह्वान ही दिखाई पड़ता रहा |
कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने 1958 में नवगीत के प्रथम संकलन ‘गीतांगिनी’ का सम्पादन किया और परम्परित गीत रचना से भिन्न आधुनिक भावबोध और शिल्प बोध से संपन्न नए गीतों को ‘नवगीत’ के रूप में हिन्दी साहित्य में स्वीकृति दिलायी | उन्होंने स्वयं द्वारा संपादित नवगीत के प्रथम संकलन ‘गीतांगिनी’के सम्पादकीय के रूप में नवगीत का घोषणा-पत्र प्रस्तुत करते हुए उसके पांच विकासशील तत्वों को निरूपित किया | वे हैं- जीवन दर्शन,आत्म निष्ठा, व्यक्तित्व बोध,प्रीति तत्व और परिसंचय | कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने नवगीत विश्लेषण के क्रम में ‘शब्द की लय’ की अपेक्षा ‘अर्थ लय’और उससे कहीं अधिक ‘मनोलय’ को महत्वपूर्ण माना है |
कवि की प्रथम नवगीत कृति ‘आओ खुली बयार’ 1962 में प्रकाशित हुई,जिसमें कवि के आधुनिकता बोध की संवेदनापूर्ण अभिव्यक्ति हुई है | इस संग्रह में संकलित ‘आरोही का गीत’ की कुछ पंक्तियाँ-लालसा पहाड़ की फसल /ढाल-ढाल झूमती हुई / बाढ़ से बची रहे मगर / मेघों को चूमती हुई / ज़िन्दगी खुदी नहीं / रेत की नदी नहीं /प्यार धार बाँध का झरे / तुम भरी-भरी लगीं मुझे /धुंध से जभी निकल पड़ीं | 1980 में उनकी दूसरी नवगीत कृति ‘भरी सड़क पर’ प्रकाशित हुई,जिसमें कवि के शब्दों में मध्यम वर्गीय जीवनानुभव और जिजीविषा की अभिव्यंजना करने वाले गीत हैं तथा मानवीयता की सहसंघर्षी अनुभव-दृष्टि भी है | 1981 में ‘रात आंख मूंदकर जगी’ का प्रकाशन हुआ, जिसकी रचनाएं प्रायः तीन दशकों में बदलती वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक और रचनात्मक मूल्य बोधों के तापमान में ढली हैं | इसमें प्रेमपरक नवगीत भी संकलित हैं, जो आस्वाद के धरातल पर पिछले नवगीतों से पर्याप्त भिन्न हैं | 1982 में इस जनपक्षधर कवि के जनबोधी गीतों का संग्रह ‘गजर आधी रात का’ प्रकाशित हुआ | इस संग्रह के जन संस्कार गीत शिल्प- सौन्दर्य की दृष्टि से अनुपम हैं | सोहर, मुंडन गीत,परिछन, बँटगवनी ही नहीं इसमें सामूहिक श्रम गान भी संकलित हैं |
राजेन्द्र प्रसाद सिंह की गीत रचनाओं का ठोस वैचारिक आधार है | कारण है मात्र भारतीय संस्कृति और साहित्य ही नहीं विश्व स्तर पर विकसित तमाम प्राचीन-अर्वाचीन साहित्य और ज्ञान धाराओं के वे गहरे अध्येता रहे | उन्होंने साहित्य में यथास्थितिवादियों, उपभोक्ता संस्कृति के परिचारकों और उनकी रचनाशीलता का हमेशा विरोध किया | वे नवगीत और आधुनिक कविता में जनपक्षधर रचनाशीलता के संवाहकों में अगली पंक्ति के रचनाकारों में से थे | उनकी अंतिम नवगीत कृति ‘लाल नील धारा’ में वैचारिक और कलागत उत्कर्ष गीत की सतत् पुनर्नवता को सिद्ध करता है –बालू के द्वीप श्रृंखला हैं / अब अभाव में घुटी नदी /गिद्धों को नाव सौंप दूं, या/ कच्छप बन सहूँ त्रासदी ?
आज कविवर राजेन्द्र प्रसाद सिंह नहीं हैं मगर अपनी सतत् पुनर्नवता को बराबर सिद्ध करते उनके नवगीत नयी रचनाशीलता को हमेशा दिशा देते रहेंगे और जीवन की अंतिम सांस तक सक्रिय एक रचनाकार को हमारी स्मृति और चर्चा से कभी ओझल नहीं होने देंगे |
Friday, 12 July 2013
Sunday, 23 June 2013
आँखों में तैरता मौत का मंजर
उत्तराखंड में आये प्रलय के बाद लगातार मौसम और पानी के थपेड़ों के बीच विकृत हो गयीं हज़ारों लाशों में आज किसी व्यक्ति की शिनाख्त निहायत मुश्किल है | मगर सेना उन लाशों के बीच ज़िन्दगी को उम्मीद देती बची हुई सांसें और धड़कनें तलाश कर घायलों को बचाने में जी-जान से जुटी है | उत्तराखंड में जल प्रलय के बाद हज़ारों जिंदगियां बचाने की जद्दोजहद के बीच क्षेत्रीय और केन्द्रीय सरकार ने पहली बार माना कि बचाव कार्य में जुटे विभागों के बीच तालमेल की कमी है | मगर सेना लोगों को मौत के मुँह से निकालने के हर संभव प्रयास कर रही है | जिंदगियां बचाने की कोशिशों को पूरे समर्पण के साथ अंजाम देती भारतीय सेना को हमारा हार्दिक नमन !
शनिवार की दोपहर मुज़फ्फरपुर के जूरन छपरा रोड नं.4 के निवासी डॉ. शोभा रानी मिश्र और एन.के.मिश्र के बहन-बहनोई धीरेन्द्र ठाकुर एवं उनकी पत्नी रेणु ठाकुर उत्तराखंड के हादसे के बाद सकुशल मुजफ्फरपुर पहुंचे हैं | ठाकुर दम्पति ने उस खौफनाक मंज़र का आँखों देखा हाल बयां करते हुए बताया कि हमलोग बच गए हैं ....मगर अब भी आँखों के सामने वही भयावह मंज़र घूम रहा है |... एक बार जैसे बल्ब फ्यूज होता है और अन्धकार छा जाता है, ठीक वैसे ही हमारा दिमाग सुन्न हो गया था | ज़िन्दगी और मौत के बीच जैसे एक पल की दूरी रह गयी थी | सब अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे | मदद की गुहार सुनने के लिए कौन रुक रहा है ...इतनी मोहलत ज़िन्दगी दे कहाँ रही थी ? श्री ठाकुर ने बताया कि 17 जून को गौरी कुंड पहुँचने के लिए निकले थे, गुप्तकाशी से आगे थे कि अचानक बादल फटने की तेज आवाज हुई और साथ में लौट आने का एनाउन्समेंट किया जाने लगा | हमलोग सात किलोमीटर नीचे उतरे तभी मन्दाकिनी कटने लगी | हम फिर से 4 किलोमीटर ऊपर चढ़कर आये | गुप्त काशी के निचले भाग में हमें पनाह मिली, जहां तीन रातें गुजारीं | ऐसा लगता था कि वहाँ से निकल ही नहीं पायेंगे | मगर ईश्वर को शायद हमें बचाना था, तभी उस दिन हमें निकलने में चार-पांच घंटे लेट हो गए, वापसी का टिकट कैंसिल कराना था इसलिए हमें देरी हो गयी और पूरी चढ़ाई नहीं चढ़ पाए, जो चढ़ गए थे, वे सभी मौत के मुँह में समा गए | गुरुवार एक बजे हम गुप्तकाशी से निकले और शुक्रवार को हरिद्वार से हमने ट्रेन पकड़ी और और आज यहाँ पहुंचे हैं | अभी भी यकीन नहीं होता कि हम उस हादसे से निकल कर वापस आ गए हैं | अब तक टीवी चैनलों और अखबारों के माध्यम से जितनी जानकारी मिल पायी थी, मगर ठाकुर दम्पति की जुबानी सुनने पर वह खौफनाक मंज़र लगा जैसे आँखों के सामने घटित हो रहा है |
उत्तराखंड से लगातार मिल रही प्रकृति की विनाशलीला की तस्वीरें और ख़बरें ह्रदय विदारक हैं और स्तब्धकारी भी | मगर इसे एक प्रकोप कहकर इसके लिए हम प्रकृति को दोष नहीं दे सकते | पर्यावरण विश्लेषकों का मानना है कि यह तबाही उदारीकरण के बाद के दशकों से उत्तराखंड में अंधाधुंध हुए प्रकृति के दोहन का परिणाम है | यह घटना हमारे लिए एक भयावह भविष्य का संकेतक भी है | समय रहते यदि हमने प्रकृति के साथ लगातार हो रहे मानवीय खिलवाड़ को नहीं रोका तो वह दिन दूर नहीं जब इससे भी बड़े हादसे हमें झेलने होंगे और कौन जाने अगले कोई बड़े प्रलय में धरती से मानव का अस्तित्व ही मिट जाए |
शनिवार की दोपहर मुज़फ्फरपुर के जूरन छपरा रोड नं.4 के निवासी डॉ. शोभा रानी मिश्र और एन.के.मिश्र के बहन-बहनोई धीरेन्द्र ठाकुर एवं उनकी पत्नी रेणु ठाकुर उत्तराखंड के हादसे के बाद सकुशल मुजफ्फरपुर पहुंचे हैं | ठाकुर दम्पति ने उस खौफनाक मंज़र का आँखों देखा हाल बयां करते हुए बताया कि हमलोग बच गए हैं ....मगर अब भी आँखों के सामने वही भयावह मंज़र घूम रहा है |... एक बार जैसे बल्ब फ्यूज होता है और अन्धकार छा जाता है, ठीक वैसे ही हमारा दिमाग सुन्न हो गया था | ज़िन्दगी और मौत के बीच जैसे एक पल की दूरी रह गयी थी | सब अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे | मदद की गुहार सुनने के लिए कौन रुक रहा है ...इतनी मोहलत ज़िन्दगी दे कहाँ रही थी ? श्री ठाकुर ने बताया कि 17 जून को गौरी कुंड पहुँचने के लिए निकले थे, गुप्तकाशी से आगे थे कि अचानक बादल फटने की तेज आवाज हुई और साथ में लौट आने का एनाउन्समेंट किया जाने लगा | हमलोग सात किलोमीटर नीचे उतरे तभी मन्दाकिनी कटने लगी | हम फिर से 4 किलोमीटर ऊपर चढ़कर आये | गुप्त काशी के निचले भाग में हमें पनाह मिली, जहां तीन रातें गुजारीं | ऐसा लगता था कि वहाँ से निकल ही नहीं पायेंगे | मगर ईश्वर को शायद हमें बचाना था, तभी उस दिन हमें निकलने में चार-पांच घंटे लेट हो गए, वापसी का टिकट कैंसिल कराना था इसलिए हमें देरी हो गयी और पूरी चढ़ाई नहीं चढ़ पाए, जो चढ़ गए थे, वे सभी मौत के मुँह में समा गए | गुरुवार एक बजे हम गुप्तकाशी से निकले और शुक्रवार को हरिद्वार से हमने ट्रेन पकड़ी और और आज यहाँ पहुंचे हैं | अभी भी यकीन नहीं होता कि हम उस हादसे से निकल कर वापस आ गए हैं | अब तक टीवी चैनलों और अखबारों के माध्यम से जितनी जानकारी मिल पायी थी, मगर ठाकुर दम्पति की जुबानी सुनने पर वह खौफनाक मंज़र लगा जैसे आँखों के सामने घटित हो रहा है |
उत्तराखंड से लगातार मिल रही प्रकृति की विनाशलीला की तस्वीरें और ख़बरें ह्रदय विदारक हैं और स्तब्धकारी भी | मगर इसे एक प्रकोप कहकर इसके लिए हम प्रकृति को दोष नहीं दे सकते | पर्यावरण विश्लेषकों का मानना है कि यह तबाही उदारीकरण के बाद के दशकों से उत्तराखंड में अंधाधुंध हुए प्रकृति के दोहन का परिणाम है | यह घटना हमारे लिए एक भयावह भविष्य का संकेतक भी है | समय रहते यदि हमने प्रकृति के साथ लगातार हो रहे मानवीय खिलवाड़ को नहीं रोका तो वह दिन दूर नहीं जब इससे भी बड़े हादसे हमें झेलने होंगे और कौन जाने अगले कोई बड़े प्रलय में धरती से मानव का अस्तित्व ही मिट जाए |
Tuesday, 12 February 2013
आचार्यत्व और कवित्व के सारस्वत प्रतिमान
जयंती पर विशेष
आचार्यत्व और कवित्व के सारस्वत प्रतिमान
महाकवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री
हिंदी काव्य जगत में जब आचार्य जानकीवल्लभ
शास्त्री का आगमन हुआ, उस समय एक ओर छायावाद का अवसान हो रहा था दूसरी ओर नवकाव्य
धारा में प्रगति के स्वर भी मुखर हो रहे थे | शास्त्री जी के व्यक्तित्व में
प्राच्यविद्या के ज्ञान से मंडित प्रतिभा और पांडित्य का अपूर्व संवलन रहा है |
हिंदी काव्य क्षेत्र में उनकी सारस्वत प्रतिभा ने निरंतर नयेपन को ही अपना लक्ष्य
बनाया |
भारतीय संस्कृति का सबसे जीवंत स्वरूप अपनी सम्पूर्ण गरिमा के साथ महाकवि
जयशंकर प्रसाद के पश्चात् शास्त्री जी में ही दृष्टिगत होता है | भारत की अजस्र
सांस्कृतिक धारा के वे अन्यतम कवि थे | वे मात्र अपने वेदांत दर्शन के ज्ञान के
कारण ही नहीं, अपितु अपनी व्यापक लोकदृष्टि के कारण भी विशिष्ट थे | उत्तर छायावाद
के प्रमुख काव्यकार महाकवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री की रचनाओं में एक ओर
कलात्मक समृद्धि मिलती है, तो दूसरी ओर समय के सत्य की यथार्थ अभिव्यक्ति की
ईमानदारी भी | आचार्य शास्त्री की प्रथम काव्यकृति ‘काकली’ का प्रकाशन 1935 में
हुआ | शास्त्री जी को छायावादी कवियों का रचना-शिल्प अपनी ओर खींच रहा था |
संस्कृत-साहित्य के अगाध ज्ञान के साथ जब हिंदी काव्य के आकर्षण का संयोग हुआ, तो
काव्य-रचना की विलक्षण और वेगवती धारा फूट पड़ी, जो लगातार परवान चढ़ती रही |
विभिन्न काव्यान्दोलनों के बीच भी उनकी रचनाशीलता निर्द्वंद्व और निर्वादी बनी रही
|
प्रेम की मार्मिक अभिव्यंजना उनकी रचनाओं में भावानुभूति के चरम पर
दृष्टिगत होती है –
“नयन में
प्राण में तुम हो,
गगन में गान में तुम हो,
न इतना भी रहा अंतर कि
मैं हूँ या तुम्हीं तुम हो |”
शास्त्री जी के कुछ गीत आपनी प्रेमानुभूति के कारण रसज्ञ
समाज के बीच सर्वाधिक लोकप्रिय हुए हैं, उनमें से एक है-
“किसने बांसुरी बजाई ?
जनम-जनम की पहचानी यह तान कहाँ से आई !
अंग-अंग फूले कदम्ब सम, सांस झकोरे झूले,
सूखी आँखों में यमुना की लोल लहर लहराई |”
Friday, 8 February 2013
बिहार खादी आन्दोलन के सूत्रधार
बिहार खादी आन्दोलन के सूत्रधार : ध्वजा प्रसाद साहू
महात्मा गांधी के आदर्शों के अनुयायी,महान स्वतंत्रता
सेनानी तथा बिहार में खादी आन्दोलन के प्रतिष्ठापक ध्वजा प्रसाद साहू की 26 वीं
पुण्य तिथि है | दो युग से भी ज्यादा बीत गए ध्वजा बाबू को गुजरे | मगर हर वर्ष
शहर के गणमान्य लोग उनके यशःकाय व्यक्तित्व को नमन करने मुजफ्फरपुर के हाथी चौक
स्थित उनके प्रतिमा-स्थल पर एकत्र होते हैं | जब भी ध्वजा बाबू की बात होती है तो
स्वाधीनता आन्दोलन और खासतौर से खादी आन्दोलन की बात अवश्य होती है | हम उस युग के
पूरे परिदृश्य पर नज़र डालें तो उस युग में गाँधी के व्यक्तित्व का कुछ ऐसा आकर्षण था कि रचनात्मक
सोच का लगभग सम्पूर्ण युवा जनमानस उनके प्रभाव में था | मगर कुछ ऐसे भी युवा थे,
जिन्हें गांधी अपने विचारों के परीक्षण की प्रयोगशाला मानते थे | ध्वजा बाबू
उन्हीं लोगों में से एक थे,जो गांधी –परिवार में बिहार का प्रतिनिधित्व कर रहे थे
| जिनसे हमेशा गांधी का संवाद बना रहता था
| एक तरह से कहें तो गांधी के सिद्धांतों और उनके वैचारिक दर्शन के व्यवहार की
कसौटी ध्वजा बाबू सरीखे लोग ही थे | ध्वजा बाबू ने गांधी का अनुसरण किया तो उसके
पहले वे एक विचार मंथन से गुजरे,पहले उनकी सोच थोड़ी अलग थी, वे गरम दल के सदस्य थे
| 1917 में गांधी के बिहार आगमन के समय जब उनका साक्षात्कार गांधी से हुआ ध्वजा
बाबू की सोच बदली| गांधी ने ध्वजा बाबू की निष्ठा और लगन देखकर
बिहार में उन्हें खादी का काम आगे बढाने का कार्य सौंपा | जिस काम में ध्वजा बाबू
पूरी लगन से जुट गए | ध्वजा बाबू की रचनात्मक
सोच कैसी थी ? यह उनके वैचारिक आलेखों से
पता चलता है | उनका एक लेख है – ‘ बेकारी की समस्या का निदान और खादी ग्रामोद्योग
का योगदान’ जिसमें उन्होंने लिखा है –“यों तो सभी देशों में बेकारी की समस्या
न्यूनाधिक बनी ही रहती है | हमारे देश में विशेषकर बिहार प्रदेश में बेकारी एक
गंभीर समस्या बनकर उपस्थित हुई है | यहाँ भूमिहीन मजदूरों की सर्वाधिक संख्या है |
जिनके पास ज़मीन है वे उनके श्रम का लाभ उठाते हैं और श्रम कानून के हिसाब से
उन्हें मजदूरी भी नहीं मिलती | उनके लिए वैकल्पिक धंधा अम्बर चरखा और करघा हो सकता
है | देश की आधी जनसँख्या स्त्रियों की है,जिनमें से अधिकांश के पूरे दिन का समय
बिना किसी उत्पादन के नष्ट होता है |” ध्वजा बाबू ने स्त्रियों के लिए खादी उद्योग
में कताई का काम सबसे उपयुक्त माना था |
पढ़े लिखे
समाज में ध्वजा बाबू की लोकप्रियता का कारण उनके वैचारिक आलेख भी बने जो उस समय
देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर छपते थे |
ध्वजा बाबू सम्पूर्ण रूप से एक महामानव
थे, जिनके हृदय में सम्पूर्ण देश की जनता का दर्द बसता था तथा जिनके निदान के लिए
वे आजीवन संघर्ष करते रहे | मैं उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ |
Saturday, 26 January 2013
‘गणतंत्र’ का अर्थ
‘गणतंत्र’ का अर्थ
गणतंत्र दिवस के अवसर पर,भारत, भारतीयता के स्वाभिमान और
सम्पूर्ण देश में व्याप्त एकता और अखंडता के प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष सूत्र को मेरा
नमन और अपने सभी मित्रों को भारतीय गणतंत्र की 63 वीं वर्षगाँठ की हार्दिक
शुभकामनाएँ !
15 अगस्त
1947 को हमने आज़ादी का जश्न मनाया था और भारत राष्ट्र की आशाओं,उम्मीदों को मूर्त रूप
देने देने के लिए 26 जनवरी 1950 को एक सर्वसम्मत संविधान लागू हुआ | आज जिसके
उद्देश्य को एक बार फिर स्मरण और आत्मसात करने की आवश्यकता है –
“हम भारत के
लोग,भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न,समाजवादी,पंथ निरपेक्ष,लोकतंत्रात्मक
गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक
न्याय विचार, अभिव्यक्ति,विश्वास,धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर
की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमे में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता
और अखंडता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ-संकल्प लेकर इस संविधान को
अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं |”
मित्रो,आज़ादी या स्वाधीनता
निरंकुश भी बनाती है,जिससे अराजकता का जन्म होता है | हम बीते 63 वर्षों के प्रौढ़
गणतंत्र के नागरिक हैं | किन्तु ‘गण’ के साथ ‘तंत्र’ का समुचित सामंजस्य अब भी
हमारा आकांक्षित लक्ष्य बना हुआ है | कभी कवि ‘धूमिल’ ने सवाल किया था –
“ आज़ादी
क्या तीन थके हुए रंगों का नाम है,
जिन्हें
एक पहिया ढोता है
या कि
इसका कोई खास मतलब होता है ?”
गणतंत्र आज़ादी के इस सही मतलब को पहचान देने की प्रक्रिया
का नाम है, हम आज भी इस पहचान के लिए संघर्षरत हैं | आज 63 वर्षों में भी देश की
बहुसंख्य जनता और विशेष रूप से देश की लगभग आधी आबादी कहा जानेवाला स्त्री-वर्ग
असुरक्षा और आतंक के साये में जी रहा है | तो फिर इस गणतंत्र का कोई अर्थ नहीं रह जाता | भारत की 60 प्रतिशत
जनसंख्या 18 से 45 वर्ष के युवाओं की है ,जिसके बल पर भारत एक युवा राष्ट्र कहा
जाता है | इस युवा शक्ति की अथाह ऊर्जा को सकारात्मक और सृजनधर्मी दिशा मिले तभी
हमारा गणतंत्र सार्थक होगा |
Wednesday, 2 January 2013
नया साल : कुछ अनुभव प्रसंग
नया साल : कुछ अनुभव प्रसंग
1.
हाथ का आंवला नहीं था
पारे की तरह था समय
मुट्ठी बंद करते ही
बिखर कर फिसल गया
कई छोटी-छोटी बूंदों में
जैसे आईना हाथ से
छूट कर बिखर गया हो कई किरचों में
सब में टूटा हुआ कई टुकड़ों में एक ही चेहरा
बेतरह दंश देती कुछ ऐसी स्मृतियों के साथ
जिन्हें सहेजने में उंगली छिल जाने
रक्त निकल आने का भय है |
2.
कुछ न कुछ बदलेगा जरूर
क्यों कि बदल गया है मौसम
दीवारों पर टंग गए हैं
हरे-भरे दृश्यों वाले नये कैलेण्डर
कुछ और रंगीन हो गए हैं
डालियों पर धूप सेंकती तितलियों के पंख
तेज सर्द हवाओं से जड़ों तक
काँप रहे हैं पुराने पेड़ |
पेंशन की क़तार में थक कर बैठ गयी
एक वृद्धा सोचती है -
मरते खपते ही सही
गुजर ही गया एक और साल
पुरानी हवेली के रोशनदान में
गौरैया ने बना लिया है एक नया घोंसला
और हमारे कस्बे में साल बदल गया है |
3.
जब शहर की तमाम घड़ियाँ
कभी तेज- सुस्त क़दमों से चलती हुई
इकट्ठी हो रहीं थीं
उस कोहरे की झील के इर्द-गिर्द
मैं सारी रात अपनी कविता में
उन प्रसूताओं की चीख सुन रहा था,
जिनके भ्रूण निष्पंद हो रहे थे
सर्द सड़कों पर |
ऐसे में कब आ गया नया साल
और मेरी कविता की उंगली पकड़ कर
खड़ा हो गया मालूम नहीं |
4.
हमारे कस्बे में साल बदल गया है
पिता से ज्यादा माँ की फिक्र में बड़े होते बच्चे
आकाश में उडती पतंगों को देखकर
भूलने लगे हैं ‘होम वर्क’ |
घर की ज़रूरतों से जूझती
बूढ़ी हो रहीं हैं कई गृहिणियां
रात उतरने से पहले
स्ट्रीट लाइट में बैड मिंटन का मैदान हो रहीं हैं सड़कें
अब भी बुजुर्गों के चेहरे पर है एक निचाट खालीपन |
पंचांग वाले कैलेण्डर में लोग बेसब्री से ढूंढ रहे हैं
नये साल में अपना भविष्य
पार्क भर गए हैं आज्ञाकारी पतियों,
संतुष्ट पत्नियों और उत्साही बच्चों से
नशा चढ़ रहा है युवकों की आँखों में
युवतियों की मुस्कराहट में समय से पहले ही
उतर रहा है – वसंत |
आकाश में उड़ रहे हैं
बच्चों के हाथ से छूट गए कुछ गुब्बारे
धीरे- धीरे सबको पता चल रहा है
कि हमारे कस्बे में साल बदल गया है |
***
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