राजनीतिक दलों का विज्ञप्ति धर्म
अपना शहर किसी भी अर्थ में
संवेदना शून्य नहीं है | हरेक छोटी- बड़ी घटना के बाद यहाँ विज्ञप्ति धर्म निभाना
सबको आता है | शहर के स्तर पर घटित चोरी – डकैती,अपहरण,दुर्घटना या हत्या की कोई भी घटना हो या देशस्तर पर घटित कोई भी घटना, समाचार पत्रों के
कार्यालयों में संवेदनापूर्ण
विज्ञप्तियों का ढेर लग जाता है और अखबारनवीस विभक्तियों के हेरफेर से यह पता लगाने में जुट जाते हैं कि
किसने किसके प्रति संवेदना व्यक्त की है ?
यह शहर छोटे-बड़े राजनीतिक दलों की
जिला इकाइयों से समृद्ध और धन्य है और धन्य हैं समाचार पत्रों के स्थानीय प्रेस और
कार्यालय क्योंकि भैये-छुटभैये नेता और सामाजिक संगठन न हो तो समाचार पत्रों के स्थानीय पृष्ठ विपन्न हो
जायेंगे | यहाँ के राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं की सचेष्टता भी जग जाहिर है |
इतनी तत्परता शायद ही किसी दूसरे शहर में
हो | अब हरेक छोटी-बड़ी घटना पर नज़र रखनी है,संवेदना आपूरित शब्दों की श्रृंखला
सजानी है तो बीच-बीच में अनायास ही उपस्थित हो जानेवाली जयंतियों और पुण्यतिथियों
में हेरफेर हो जाना स्वाभाविक है | अगर किसी से जन्मतिथि के अवसर पर पुण्यतिथि
मनाये जाने की विज्ञप्ति जारी हो जाए तो
इसके लिए पैदाहोनेवाले या मरने वाले महापुरुषों को दोष देने से क्या फायदा ? समय
के अंतराल में जन्मतिथि और पुण्यतिथि सब बराबर लगती है | श्रद्धांजलि तो दोनों में ही अर्पित करनी पड़ती है | ऐसे संवेदनात्मक अवसर पर
‘आस्था’ और ‘समर्पण’ जैसे सम्वेद्नापूर्ण शब्द, शब्द कोशों की मोटी-मोटी जिल्दों की दीवारों से बाहर निकलकर भाषण और विज्ञप्तियों तक आने के
लिए छटपटाते भी तो रहते हैं |
शहर की कोई भी घटना तथाकथित नेताओं के लिए संवेदनात्मक-
औपचारिकता के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं | कभी –कभी तो संवेदना के शब्द कम और
संवेदना जाहिर करनेवालों के नाम इतने अधिक होते हैं कि उन नामों के दबाव में संवेदना स्वयं भी दबकर
संवेदनशून्य हो जाती है|
अपने राज्य के अतिरिक्त
दूसरे राज्य या देशों में कोई न कोई विभीषिका या त्रासदी घटती ही रहती है |ऐसे में
जब पूरा विश्व मर्माहत हो रहा हो तो अपने शहर के नेतागण चुप कैसे बैठ सकते हैं ?कुछ
वर्षों पहले गुजरात में भीषण भूकंप आया था | भूकंप पीड़ितों के सहायतार्थ राहत की राशि इकट्ठी करने के लिए लोग सड़कों पर उतर आये, प्रधानमन्त्री
राहतकोष में ड्राफ्ट भेजने का सिलसिला चल पड़ा |
लोगों ने भूकंप पीड़ितों के लिए बूट पालिश तक की,भिक्षाटन किया और ड्राफ्ट प्रदान
करते हुए प्रशासन के आला अधिकारियों के साथ खूब तस्वीरें भी उतरवायीं | पहले के
लोग गुप्तदान में विश्वास करते थे मगर अब दान दिया है तो यश
की चिंता भी अनिवार्य समझते हैं | मगर संवेदना ऐसे अवसर पर जब पूरा विश्व शोकाकुल
हो और टीवी पर इस त्रासदी का समाचार पढ़ते हुए प्रवाचिका का गला भी भर आता हो | उस
समय दान देते हुए इन तथाकथित नेताओं का मुस्कराहट भरा चेहरा सोचने को जरूर मजबूर
करता है | कुछ वर्षों पूर्व का ही एक और वाकया है शहर के व्यस्ततम बाज़ार मोतीझील
में एक भयानक विस्फोट हुआ था | खबर छापने में अखबारों में प्रतियोगिता-सी चल पड़ी |
कौन मृतकों कितनी संख्या लिखता है ? गनीमत थी विस्फोट की भयानकता के अनुपात में
हताहत लोगों की संख्या कम थी | विस्फोट की
रात शहर के जितने लोग घटनास्थल पर इकट्ठे
हुए उससे ज्यादा भीड़ सुबह में अखबार की सुर्खियाँ देखकर जुटी | देशी-विदेशी टीवी चैनल
और मीडियाकर्मी भी कवरेज के लिए पहुंचे | इतना सब हुआ तो भला शहर के नेतागण चुप
कैसे रहते ? बाजारबंदी से लेकर धरना प्रदर्शन होने लगे |
मृतकों और घायलों के
परिजनों के लिए मुआवजा राशि की मांग और सहानुभूति के शब्दों से लबरेज़ विज्ञप्तियों
के ढेर समाचार पत्रों के कार्यालयों में लगने लगे | कुछ नामी-गिरामी मंत्रियों और
विधायकों ने तो मृतकों के परिजनों के लिए नौकरी देने तक की घोषणा तक कर दी लेकिन
सप्ताह भर बाद संवेदनाओं का यह आवेग धीरे-धीरे शांत होने लगा | महीनों तक विस्फोट
में अपने पिता के मृत होने के बाद बुरी तरह घायल माँ और बहनों के साथ अस्पताल में
पीड़ा भरे वर्तमान और अनिश्चित भविष्य के बारे सोचता हुआ, सरकारी और सामाजिक
संस्थाओं के द्वारा सहायता की बाट जोहता
एक युवक महीनों तक कार्यालयों के चक्कर लगाने के बाद थक हारकर बैठ गया | कुछ
नेताओं को तो जैसे घटना-दुर्घटना का इंतज़ार रहता है | उधर घटना घटी नहीं कि इधर
विज्ञप्ति तैयार और फिर किसी न किसी कार्यकर्त्ता की साइकिल-मोटर साइकिल समाचार
पत्रों के दफ्तरों की दौड़ लगाने लगती है | वैसे घटना कोई भी हो, पिछली रिलीज से
यदि उसकी भाषा अक्षरशः मिल भी जाए तो क्या फर्क पड़ता है | इस शहर के लिए
अपहरण,विस्फोट,हत्या और डकैती सब बराबर हैं, न शहर की नींद को कोई फर्क पड़ता है
और न विज्ञप्ति धर्म निबाहने वाले नेताओं को |
धन्य हैं, ये तथाकथित
नेतागण, धन्य हैंउनके विज्ञप्तिवाहक कार्यकर्ता और धन्य है अपना शहर जो हरेक
छोटी-बड़ी घटना के बाद थोड़ी देर के लिए नींद से जागता है और फिर करवट बदल लेता है|
No comments:
Post a Comment