Tuesday, 18 September 2012

राजनीतिक दलों का विज्ञप्ति धर्म

                                           राजनीतिक दलों का विज्ञप्ति धर्म

अपना शहर किसी भी अर्थ में संवेदना शून्य नहीं है | हरेक छोटी- बड़ी घटना के बाद यहाँ विज्ञप्ति धर्म निभाना सबको आता है | शहर के स्तर पर घटित चोरी – डकैती,अपहरण,दुर्घटना या हत्या की  कोई भी घटना हो या देशस्तर पर घटित कोई भी घटना, समाचार पत्रों के कार्यालयों में संवेदनापूर्ण विज्ञप्तियों का ढेर लग जाता है और अखबारनवीस विभक्तियों के   हेरफेर से यह पता लगाने में जुट जाते हैं कि किसने किसके प्रति संवेदना व्यक्त की है ?
             यह शहर छोटे-बड़े राजनीतिक दलों की जिला इकाइयों से समृद्ध और धन्य है और धन्य हैं समाचार पत्रों के स्थानीय प्रेस और कार्यालय क्योंकि भैये-छुटभैये नेता और सामाजिक संगठन न हो  तो समाचार पत्रों के स्थानीय पृष्ठ विपन्न हो जायेंगे | यहाँ के राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं की सचेष्टता भी जग जाहिर है | इतनी तत्परता शायद ही  किसी दूसरे शहर में हो | अब हरेक छोटी-बड़ी घटना पर नज़र रखनी है,संवेदना आपूरित शब्दों की श्रृंखला सजानी है तो बीच-बीच में अनायास ही उपस्थित हो जानेवाली जयंतियों और पुण्यतिथियों में हेरफेर हो जाना स्वाभाविक है | अगर किसी से जन्मतिथि के अवसर पर पुण्यतिथि मनाये जाने की  विज्ञप्ति जारी हो जाए तो इसके लिए पैदाहोनेवाले या मरने वाले महापुरुषों को दोष देने से क्या फायदा ? समय के अंतराल में जन्मतिथि और पुण्यतिथि सब बराबर लगती है | श्रद्धांजलि तो दोनों में ही  अर्पित करनी पड़ती है | ऐसे संवेदनात्मक अवसर पर ‘आस्था’ और ‘समर्पण’ जैसे सम्वेद्नापूर्ण शब्द, शब्द कोशों की  मोटी-मोटी जिल्दों की दीवारों  से बाहर निकलकर भाषण और विज्ञप्तियों तक आने के लिए छटपटाते भी तो रहते हैं |
            शहर की  कोई भी घटना तथाकथित नेताओं के लिए संवेदनात्मक- औपचारिकता के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं | कभी –कभी तो संवेदना के शब्द कम और संवेदना जाहिर करनेवालों के नाम इतने अधिक होते हैं कि  उन नामों के दबाव में संवेदना स्वयं भी दबकर संवेदनशून्य हो जाती है|
अपने राज्य के अतिरिक्त दूसरे राज्य या देशों में कोई न कोई विभीषिका या त्रासदी घटती ही रहती है |ऐसे में जब पूरा विश्व मर्माहत हो रहा हो तो अपने शहर के नेतागण चुप कैसे बैठ सकते हैं ?कुछ वर्षों पहले गुजरात में भीषण भूकंप आया था | भूकंप पीड़ितों के सहायतार्थ राहत की  राशि इकट्ठी करने के लिए लोग सड़कों पर उतर आये, प्रधानमन्त्री  राहतकोष में ड्राफ्ट भेजने का सिलसिला चल पड़ा | लोगों ने भूकंप पीड़ितों के लिए बूट पालिश तक की,भिक्षाटन किया और ड्राफ्ट प्रदान करते हुए प्रशासन के आला अधिकारियों के साथ खूब तस्वीरें भी उतरवायीं | पहले के लोग गुप्तदान में विश्वास करते थे मगर अब दान दिया है तो यश की चिंता भी अनिवार्य समझते हैं | मगर संवेदना ऐसे अवसर पर जब पूरा विश्व शोकाकुल हो और टीवी पर इस त्रासदी का समाचार पढ़ते हुए प्रवाचिका का गला भी भर आता हो | उस समय दान देते हुए इन तथाकथित नेताओं का मुस्कराहट भरा चेहरा सोचने को जरूर मजबूर करता है | कुछ वर्षों पूर्व का ही एक और वाकया है शहर के व्यस्ततम बाज़ार मोतीझील में एक भयानक विस्फोट हुआ था | खबर छापने में अखबारों में प्रतियोगिता-सी चल पड़ी | कौन मृतकों कितनी संख्या लिखता है ? गनीमत थी विस्फोट की भयानकता के अनुपात में हताहत लोगों की संख्या कम थी | विस्फोट  की  रात शहर के जितने लोग घटनास्थल पर इकट्ठे हुए उससे ज्यादा भीड़  सुबह में अखबार की  सुर्खियाँ देखकर जुटी | देशी-विदेशी टीवी चैनल और मीडियाकर्मी भी कवरेज के लिए पहुंचे | इतना सब हुआ तो भला शहर के नेतागण चुप कैसे रहते ? बाजारबंदी से लेकर धरना प्रदर्शन होने लगे |
मृतकों और घायलों के परिजनों के लिए मुआवजा राशि की मांग और सहानुभूति के शब्दों से लबरेज़  विज्ञप्तियों के ढेर समाचार पत्रों के कार्यालयों में लगने लगे | कुछ नामी-गिरामी मंत्रियों और विधायकों ने तो मृतकों के परिजनों के लिए नौकरी देने तक की घोषणा तक कर दी लेकिन सप्ताह भर बाद संवेदनाओं का यह आवेग धीरे-धीरे शांत होने लगा | महीनों तक विस्फोट में अपने पिता के मृत होने के बाद बुरी तरह घायल माँ और बहनों के साथ अस्पताल में पीड़ा भरे वर्तमान और अनिश्चित भविष्य के बारे सोचता हुआ, सरकारी और सामाजिक संस्थाओं के द्वारा सहायता की बाट  जोहता एक युवक महीनों तक कार्यालयों के चक्कर लगाने के बाद थक हारकर बैठ गया | कुछ नेताओं को तो जैसे घटना-दुर्घटना का इंतज़ार रहता है | उधर घटना घटी नहीं कि इधर विज्ञप्ति तैयार और फिर किसी न किसी कार्यकर्त्ता की साइकिल-मोटर साइकिल समाचार पत्रों के दफ्तरों की दौड़ लगाने लगती है | वैसे घटना कोई भी हो, पिछली रिलीज से यदि उसकी भाषा अक्षरशः मिल भी जाए तो क्या फर्क पड़ता है | इस शहर के लिए अपहरण,विस्फोट,हत्या और डकैती सब बराबर हैं, न शहर की नींद को कोई फर्क पड़ता है और न विज्ञप्ति धर्म निबाहने वाले नेताओं को |
                      धन्य हैं, ये तथाकथित नेतागण, धन्य हैंउनके विज्ञप्तिवाहक कार्यकर्ता और धन्य है अपना शहर जो हरेक छोटी-बड़ी घटना के बाद थोड़ी देर के लिए नींद से जागता है और फिर करवट बदल लेता है|

Saturday, 15 September 2012

पानी गए न ऊबरै


                          पानी गए न ऊबरै   

पिछले दो दिनों से लगातार हो रही बारिश ने बैचैन करनेवाली उमस भरी गर्मी से राहत तो दी है मगर अपने शहर में बरसात जनजीवन को अस्त व्यस्त करनेवाली मुसीबतों के साथ आती है | हिंदी में ‘पानी’ को लेकर कई मुहावरे प्रचलित हैं –‘पानी उतारना’,’पानी-पानी होना’,’दोनों पानी मारना’,’पानी रखना’ आदि|
         जब ये मुहावरे हमारी भाषा में आये थे, तब हमारा चिकित्सा शास्त्र इतना विकसित नहीं हुआ था | आज ‘पानी चढ़ना’ भी एक सशक्त मुहावरा है | लगातार दो तीन दिनों की  मूसलधार बारिश में अपना पूरा शहर जब ‘पानी-पानी होने’ लगता है  तब हमारे नगरनिगम कार्यालय में ‘पानी चढ़ते’ देखा जा सकता है|  अपने शहर के लोग इधर कुछ पारदर्शी भाषा के हिमायती हो गए हैं  इसलिए पानी की बात भी पानी के मुहावरों में नहीं करते और सीधे कह डालते हैं-“नगर निगम की कलई खुल गयी |” हालाँकि यह भी एक मुहावरा है | मगर कभी कलई चढ़ी हो तो खुले यहाँ तो हालत यह है कि कभी कलई चढ़ी ही नहीं |
          वैसे पानी के साथ इस शहर का पुराना रिश्ता है | लेकिन उससे कहीं कम पुराना नहीं है यहाँ की सड़कों और नालों का प्रेम सम्बन्ध | कभी-कभी जब दोनों प्रेम की  पराकाष्ठा पर होते हैं तो इस तरह एकाकार हो जाते हैं कि दोनों का अलग-अलग अस्तित्व ढूंढना कठिन हो जाता है | नगरनिगम यदि सत्संगियों की कोई आध्यात्मिक  संस्था होता तो बड़े ही दार्शनिक अंदाज़ में तर्क दे  सकता था कि जल ही जीवन है | धरती का एक तिहाई हिस्सा तो जल ही है, जल से ही हमारी उत्पत्ति है | हमारे मत्स्यावतार ने जल को ही अपना अवतरण-स्थल बनाया था ऐसे में कभी आधे अधूरे डूब कर ही सही  नगरवासियों द्वारा जल के महत्व को समझ लेना क्या बुरा है |
          आध्यात्मिक  जगत में तो ‘डूबकर’ ही ‘पार’ उतरने की बात की जाती है, जो डूबने से डरते हैं,वे किनारे बैठे हाथ मलते रह जाते हैं | फिर नगरनिगम यह भी तो कह सकता है कि जल से तो इस नदी तटवर्ती  शहर का पुराना रिश्ता रहा  है | शहर के बीचोबीच यहाँ एक झील वर्षों पहले अन्तःसलिला हो चुकी है,जो बारिश के दिनों में ही सतह पर प्रकट होती है | फिर उसी पानी से तो यह शहर  ‘पानीदार’ बना हुआ है |
          एक दार्शनिक ने निराशा से बचने का सीधा और सरल उपाय बताया है कि हम उम्मीद करना छोड़ दें,न हम उम्मीद करेंगे और न कभी निराश होंगे | कुछ उसी शैली में हम यदि नगरनिगम के बारे में सघन सहानुभूति से सोचना शुरू करें तो कह सकते हैं कि इतने बड़े नगर में अकेला नगरनिगम कर ही क्या सकता है? हम लगातार विकारों का त्याग कर स्वयं की शुचिता सिद्ध करते रहें,शर्मोहया त्यागकर नालों की सेहत बढ़ाते रहें और नगरनिगम से उम्मीद करें कि बस उसके कर्मचारी पलक झपकते वहां सफाई कार्य शुरू कर दें तो यह बात बहुत व्यावहारिक न होगी | शहरवासियों को कम से कम कविवर रहीम के दोहे से सीख लेनी चाहिए, जिन्होंने पानी बचा कर रखने की हिदायत दी है | हमें महीनों से बकाये वेतन के लिए संघर्ष करते नगरनिगम के कर्मचारियों के लिए थोड़ा पानी अपनी आँखों में अवश्य बचाकर रखना चाहिए |

                                           ‘हिन्दुस्तान’ दैनिक में प्रकाशित |

Thursday, 13 September 2012

शहर अब भी संभावना है |


                                         शहर अब भी संभावना है |

कुछ वर्षों पहले मुजफ्फरपुर पर एक कविता लिखी थी, जिसमें मैंने इसे “बनती हुई सड़कों और टूटती दीवारों का शहर” कहा था | उस कविता में जो शहर उभरा था, उसके बाद से अबतक बूढी गंडक में बहुत सारा पानी बह चुका है और उसके ऊपर बना एक अरसा पुराना हर रोज़ शहर की आधी आबादी को नदी के पार उतारनेवाला अखाड़ाघाट पुल थोड़ा और जर्जर हो गया है | कभी पढ़ा था शहर संभावनाओं से भरा होता है | यह शहर भविष्य की हजारों योजनाओं से भरा है | नगरनिगम और जिला परिषद् की बैठकों में योजनाएं बनती हैं | मेयर और अध्यक्ष हमेशा संभावनाओं से लबरेज़  होते हैं, संभावनाएं ही योजनाओं में ढलती हैं | काम होना या न होना शहर के अपने भाग्य पर निर्भर करता है | शहर में इस बीच दो फ्लाई ओवर बने हैं | एक आमगोला रेलवे क्रॉसिंग  पर, दूसरा चंद्रलोक रेलवे क्रॉसिंग  पर | आमगोला फ्लाईओवर से जहाँ हरिसभा से अघोरिया बाज़ार होते हुए रामदयालु नगर तक का मार्ग आसान  हुआ है,वहीँ चंद्रलोक फ्लाईओवर ने मोतीझील से कलमबाग चौक या स्टेशन रोड तक का मार्ग सुलभ कर दिया है | इस फ्लाई ओवर पर खड़े होकर इस शहर के महानगर बनने की अनेक संभावनाएं तलाश की जा सकती हैं | हालाँकि बरसात के दिनों में  मोतीझील में यदि उतरें तो वहां  घुटने भर लगा पानी आपकी उम्मीदें पस्त कर देगा  | इधर फ्लाईओवर बने हैं और उधर पुल लगातार जर्जर होता गया है | योजना बनी है कि इसके समानान्तर चंदवारा में भी  एक पुल बनेगा ताकि इसपर कुछ दबाव कम हो सके | मगर इस पुल की मरम्मत की तत्काल कोई योजना सुनने में नहीं आई | पुल केवल शहर के एक हिस्से को  दूसरे हिस्से  से ही  नहीं जोड़ता बल्कि शहरवासियों के आपसी संबंधों को भी जीवंत रखता है | मगर जब शहर के हुक्मरानों की  इच्छा शक्ति और कर्तव्यों के बीच का पुल ही जर्जर हो रहा है तब इस पुल के बारे में सोचना बेमानी है|









Wednesday, 5 September 2012

मुजफ्फरपुर के लिए एक कविता


मुजफ्फरपुर के लिए एक कविता

अगर आप  अरसे बाद
कभी लौटें इस शहर में
तो सोचेंगे कि
बरसों से वैसे ही क्यों पड़ा है
यह शहर बिहार के नक़्शे पर
अपनी जगह बनाये हुए
लेकिन जरा ठहर कर गौर करें
तो कुछ बातें हैं, जो चमत्कृत करतीं हैं
इस शहर की
अजीब है यह कस्बानुमा शहर
जिसकी उम्मीदों में हमेशा करवट
लेता है कोई महानगर |

हर रोज राजधानियों को
अपने सपने बेचते
युवाओं का शहर,
अपनी परिस्थितियों से बंधे
बेबस खीझते बुजुर्गों का शहर,
बनती हुई सड़कों और टूटती दीवारों का शहर |

इस शहर में अन्तःसलिला है एक झील
और शहर के बीचोबीच सीधा तना
हमेशा खड़ा रहता है एक आदमी
जो एक पैर से हर रोज राजधानी तक जाता है
दूसरे पैर से लगातार रोके हुए है
इस शहर को अपनी धुरी पर
हरी, नीली,लाल और केसरिया रौशनी में
बदलता रहता है उसका चेहरा
जो कभी- कभी एक-एक सिक्के की दया उगाहता
बड़ा ही भोला और दयनीय हो जाता है
तब उसका चेहरा एक कटोरे में बदल जाता है |

कहीं सड़क के बीच में खड़े हैं
तो कहीं कई पार्टियों का झंडा
थामे हुए गाँधी जी
ऊंचे टावर पर वर्षों से बैठे हैं |
आप गिनना चाहें तो गिन सकते हैं,
पान की दुकानों से
कहीं कम नहीं हैं यहाँ बच्चों के स्कूल |

कुछ है, जो देश के किसी भी कोने-से
साफ दीख जाता है इस शहर में
शाम होते ही
नृत्य-गीत करती हुई एक सड़क
मंदिर से शुरू होकर मजार तक जाती है
और रात होते ही कई
छोटी-छोटी गलियों में खो जाती है,
जिसे हर सुबह ढूंढ कर
निकाल लाते हैं पुलिस और पत्रकार |

मंदिर की घंटियों में जब घुलती है
मस्जिद की अजान,गिरजा घर की प्रार्थना में,
गुरुद्वारा के सबद
इसी समवेत से जगता है यह उनींदा शहर |
इस शहर में चिड़ियों को मालूम नहीं है
गुम्बदों का फर्क
इस शहर में  ख़ुशी और गम,
दुःख और तकलीफ का
कोई मज़हब नहीं है |

इन सब के बावजूद
धूप में इस शहर का खुलना
और रात गए अपने नसीब के
नीम अँधेरे में डूब जाना ज्यों का त्यों है
जिसे युवा कवियों की एक पूरी जमात
अपनी कविताओं में पकड़ना चाहती है,
जिसके बारे में बहस करते हैं बुद्धिजीवी |
सुबह फिर अपनी दिनचर्या की
धुरी पर घूमने लगता है यह शहर
कुछ लोग पुल और फ्लाईओवर पार करते हैं
एक बड़ी आबादी स्कूल-कॉलेज
और दफ्तरों में समा जाती है
शहर छोटी बड़ी सवारियों की आवाज़ों और
साइकिल रिक्शों की घंटियों में अंगड़ाई लेता है
और फिर करवट बदल लेता है |
         ***