Thursday, 13 September 2012

शहर अब भी संभावना है |


                                         शहर अब भी संभावना है |

कुछ वर्षों पहले मुजफ्फरपुर पर एक कविता लिखी थी, जिसमें मैंने इसे “बनती हुई सड़कों और टूटती दीवारों का शहर” कहा था | उस कविता में जो शहर उभरा था, उसके बाद से अबतक बूढी गंडक में बहुत सारा पानी बह चुका है और उसके ऊपर बना एक अरसा पुराना हर रोज़ शहर की आधी आबादी को नदी के पार उतारनेवाला अखाड़ाघाट पुल थोड़ा और जर्जर हो गया है | कभी पढ़ा था शहर संभावनाओं से भरा होता है | यह शहर भविष्य की हजारों योजनाओं से भरा है | नगरनिगम और जिला परिषद् की बैठकों में योजनाएं बनती हैं | मेयर और अध्यक्ष हमेशा संभावनाओं से लबरेज़  होते हैं, संभावनाएं ही योजनाओं में ढलती हैं | काम होना या न होना शहर के अपने भाग्य पर निर्भर करता है | शहर में इस बीच दो फ्लाई ओवर बने हैं | एक आमगोला रेलवे क्रॉसिंग  पर, दूसरा चंद्रलोक रेलवे क्रॉसिंग  पर | आमगोला फ्लाईओवर से जहाँ हरिसभा से अघोरिया बाज़ार होते हुए रामदयालु नगर तक का मार्ग आसान  हुआ है,वहीँ चंद्रलोक फ्लाईओवर ने मोतीझील से कलमबाग चौक या स्टेशन रोड तक का मार्ग सुलभ कर दिया है | इस फ्लाई ओवर पर खड़े होकर इस शहर के महानगर बनने की अनेक संभावनाएं तलाश की जा सकती हैं | हालाँकि बरसात के दिनों में  मोतीझील में यदि उतरें तो वहां  घुटने भर लगा पानी आपकी उम्मीदें पस्त कर देगा  | इधर फ्लाईओवर बने हैं और उधर पुल लगातार जर्जर होता गया है | योजना बनी है कि इसके समानान्तर चंदवारा में भी  एक पुल बनेगा ताकि इसपर कुछ दबाव कम हो सके | मगर इस पुल की मरम्मत की तत्काल कोई योजना सुनने में नहीं आई | पुल केवल शहर के एक हिस्से को  दूसरे हिस्से  से ही  नहीं जोड़ता बल्कि शहरवासियों के आपसी संबंधों को भी जीवंत रखता है | मगर जब शहर के हुक्मरानों की  इच्छा शक्ति और कर्तव्यों के बीच का पुल ही जर्जर हो रहा है तब इस पुल के बारे में सोचना बेमानी है|









1 comment:

  1. मेरे बचपन की कई यादें जुडी हैं उस पुल से, क्यूँकि तब से आज तक उसमे बेहतरी के मामलों में कोई बदलाव नहीं आये हैं| वो कल भी बीमार सा दीखता था और आज उसकी हालत और ख़राब दिखती है|

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