Saturday, 15 September 2012

पानी गए न ऊबरै


                          पानी गए न ऊबरै   

पिछले दो दिनों से लगातार हो रही बारिश ने बैचैन करनेवाली उमस भरी गर्मी से राहत तो दी है मगर अपने शहर में बरसात जनजीवन को अस्त व्यस्त करनेवाली मुसीबतों के साथ आती है | हिंदी में ‘पानी’ को लेकर कई मुहावरे प्रचलित हैं –‘पानी उतारना’,’पानी-पानी होना’,’दोनों पानी मारना’,’पानी रखना’ आदि|
         जब ये मुहावरे हमारी भाषा में आये थे, तब हमारा चिकित्सा शास्त्र इतना विकसित नहीं हुआ था | आज ‘पानी चढ़ना’ भी एक सशक्त मुहावरा है | लगातार दो तीन दिनों की  मूसलधार बारिश में अपना पूरा शहर जब ‘पानी-पानी होने’ लगता है  तब हमारे नगरनिगम कार्यालय में ‘पानी चढ़ते’ देखा जा सकता है|  अपने शहर के लोग इधर कुछ पारदर्शी भाषा के हिमायती हो गए हैं  इसलिए पानी की बात भी पानी के मुहावरों में नहीं करते और सीधे कह डालते हैं-“नगर निगम की कलई खुल गयी |” हालाँकि यह भी एक मुहावरा है | मगर कभी कलई चढ़ी हो तो खुले यहाँ तो हालत यह है कि कभी कलई चढ़ी ही नहीं |
          वैसे पानी के साथ इस शहर का पुराना रिश्ता है | लेकिन उससे कहीं कम पुराना नहीं है यहाँ की सड़कों और नालों का प्रेम सम्बन्ध | कभी-कभी जब दोनों प्रेम की  पराकाष्ठा पर होते हैं तो इस तरह एकाकार हो जाते हैं कि दोनों का अलग-अलग अस्तित्व ढूंढना कठिन हो जाता है | नगरनिगम यदि सत्संगियों की कोई आध्यात्मिक  संस्था होता तो बड़े ही दार्शनिक अंदाज़ में तर्क दे  सकता था कि जल ही जीवन है | धरती का एक तिहाई हिस्सा तो जल ही है, जल से ही हमारी उत्पत्ति है | हमारे मत्स्यावतार ने जल को ही अपना अवतरण-स्थल बनाया था ऐसे में कभी आधे अधूरे डूब कर ही सही  नगरवासियों द्वारा जल के महत्व को समझ लेना क्या बुरा है |
          आध्यात्मिक  जगत में तो ‘डूबकर’ ही ‘पार’ उतरने की बात की जाती है, जो डूबने से डरते हैं,वे किनारे बैठे हाथ मलते रह जाते हैं | फिर नगरनिगम यह भी तो कह सकता है कि जल से तो इस नदी तटवर्ती  शहर का पुराना रिश्ता रहा  है | शहर के बीचोबीच यहाँ एक झील वर्षों पहले अन्तःसलिला हो चुकी है,जो बारिश के दिनों में ही सतह पर प्रकट होती है | फिर उसी पानी से तो यह शहर  ‘पानीदार’ बना हुआ है |
          एक दार्शनिक ने निराशा से बचने का सीधा और सरल उपाय बताया है कि हम उम्मीद करना छोड़ दें,न हम उम्मीद करेंगे और न कभी निराश होंगे | कुछ उसी शैली में हम यदि नगरनिगम के बारे में सघन सहानुभूति से सोचना शुरू करें तो कह सकते हैं कि इतने बड़े नगर में अकेला नगरनिगम कर ही क्या सकता है? हम लगातार विकारों का त्याग कर स्वयं की शुचिता सिद्ध करते रहें,शर्मोहया त्यागकर नालों की सेहत बढ़ाते रहें और नगरनिगम से उम्मीद करें कि बस उसके कर्मचारी पलक झपकते वहां सफाई कार्य शुरू कर दें तो यह बात बहुत व्यावहारिक न होगी | शहरवासियों को कम से कम कविवर रहीम के दोहे से सीख लेनी चाहिए, जिन्होंने पानी बचा कर रखने की हिदायत दी है | हमें महीनों से बकाये वेतन के लिए संघर्ष करते नगरनिगम के कर्मचारियों के लिए थोड़ा पानी अपनी आँखों में अवश्य बचाकर रखना चाहिए |

                                           ‘हिन्दुस्तान’ दैनिक में प्रकाशित |

1 comment:

  1. आज मैंने शहर कि हालत देखी है| कई लोग मिले जो हंसते दिखे| पर शायद हीं कोई अन्दर से कोई ख़ुशी हो| आज वैसे भी शहर की हालत पे हम खुछ कर भी नहीं सकते हैं| ऐसे में के शेर याद आ रहा है:
    मौजों से कट गए थे
    किनारे कभी कभी,
    हम भी हँस पड़े थे
    दर के मारे कभी कभी.

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