मुजफ्फरपुर के लिए एक कविता
अगर आप अरसे बाद
कभी लौटें इस शहर में
तो सोचेंगे कि
बरसों से वैसे ही क्यों पड़ा है
कभी लौटें इस शहर में
तो सोचेंगे कि
बरसों से वैसे ही क्यों पड़ा है
यह शहर बिहार के नक़्शे पर
अपनी जगह बनाये हुए
लेकिन जरा ठहर कर गौर करें
तो कुछ बातें हैं, जो चमत्कृत करतीं हैं
तो कुछ बातें हैं, जो चमत्कृत करतीं हैं
इस शहर की
अजीब है यह कस्बानुमा शहर
जिसकी उम्मीदों में हमेशा करवट
जिसकी उम्मीदों में हमेशा करवट
लेता है कोई महानगर |
हर रोज राजधानियों को
अपने सपने बेचते
युवाओं का शहर,
अपनी परिस्थितियों से बंधे
बेबस खीझते बुजुर्गों का शहर,
बनती हुई सड़कों और टूटती दीवारों का शहर |
बेबस खीझते बुजुर्गों का शहर,
बनती हुई सड़कों और टूटती दीवारों का शहर |
इस शहर में अन्तःसलिला है एक झील
और शहर के बीचोबीच सीधा तना
हमेशा खड़ा रहता है एक आदमी
जो एक पैर से हर रोज राजधानी तक जाता है
दूसरे पैर से लगातार रोके हुए है
इस शहर को अपनी धुरी पर
हरी, नीली,लाल और केसरिया रौशनी में
बदलता रहता है उसका चेहरा
बदलता रहता है उसका चेहरा
जो कभी- कभी एक-एक सिक्के की दया उगाहता
बड़ा ही भोला और दयनीय हो जाता है
तब उसका चेहरा एक कटोरे में बदल जाता है |
कहीं सड़क के बीच में खड़े हैं
तो कहीं कई पार्टियों का झंडा
तो कहीं कई पार्टियों का झंडा
थामे हुए गाँधी जी
ऊंचे टावर पर वर्षों से बैठे हैं |
आप गिनना चाहें तो गिन सकते हैं,
पान की दुकानों से
कहीं कम नहीं हैं यहाँ बच्चों के स्कूल |
ऊंचे टावर पर वर्षों से बैठे हैं |
आप गिनना चाहें तो गिन सकते हैं,
पान की दुकानों से
कहीं कम नहीं हैं यहाँ बच्चों के स्कूल |
कुछ है, जो देश के किसी भी कोने-से
साफ दीख जाता है इस शहर में
शाम होते ही
नृत्य-गीत करती हुई एक सड़क
मंदिर से शुरू होकर मजार तक जाती है
और रात होते ही कई
छोटी-छोटी गलियों में खो जाती है,
जिसे हर सुबह ढूंढ कर
जिसे हर सुबह ढूंढ कर
निकाल लाते हैं पुलिस और पत्रकार |
मंदिर की घंटियों में जब घुलती है
मस्जिद की अजान,गिरजा घर की प्रार्थना में,
गुरुद्वारा के सबद
इसी समवेत से जगता है यह उनींदा शहर |
इस शहर में चिड़ियों को मालूम नहीं है
गुम्बदों का फर्क
गुम्बदों का फर्क
इस शहर में ख़ुशी और गम,
दुःख और तकलीफ का
कोई मज़हब नहीं है |
इन सब के बावजूद
धूप में इस शहर का खुलना
और रात गए अपने नसीब के
नीम अँधेरे में डूब जाना ज्यों का त्यों है
जिसे युवा कवियों की एक पूरी जमात
अपनी कविताओं में पकड़ना चाहती है,
जिसके बारे में बहस करते हैं बुद्धिजीवी |
सुबह फिर अपनी दिनचर्या की
धुरी पर घूमने लगता है यह शहर
कुछ लोग पुल और फ्लाईओवर पार करते हैं
एक बड़ी आबादी स्कूल-कॉलेज
और दफ्तरों में समा जाती है
शहर छोटी बड़ी सवारियों की आवाज़ों और
साइकिल रिक्शों की घंटियों में अंगड़ाई लेता है
और फिर करवट बदल लेता है |
***
No comments:
Post a Comment